बुधवार, 19 जून 2013

मोदी, आडवाणी और संघ का एजेण्डा



सन् 2014 के आमचुनाव के लिए भाजपा की चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष पद पर नरेन्द्र मोदी के मनोनयन ;जून 2013 ने प्याले में उठने वाले तूफान से कुछ बड़ा तूफान बरपा कर दिया है। यह दिलचस्प है कि पहली बार इस तरह के पद पर मनोनयन ने इतना हंगामा और विवाद खड़ा किया है। इसके लिए मोदी की प्रचार मशीनरी काफी हद तक जिम्मेदार है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया हो।  हां, यह अवश्य हो सकता है कि प्रचार प्रमुख के रूप में मोदी की नियुक्ति, उनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित होने की ओर पहला कदम हो। मोदी के मनोनयन का सबसे कड़ा विरोध लालकृष्ण आडवाणी ने किया, जो कि मोदी के राजनैतिक आका माने जाते हैं और जिन्होंने मोदी को आगे बढ़ाने और उनका बचाव करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यदि मोदी आज भाजपा और गुजरात में इतने शक्तिशाली होकर उभरे हैं तो उसका काफी कुछ श्रेय आडवाणी और उनकी राजनीति को जाता है। आडवाणी ने ही मुख्यमंत्री बतौर मोदी का नाम प्रस्तावित किया था। गुजरात में भाजपा के गिरते  ग्राफ को मोदी ने सम्हाला। इसमें सन् 2002 के कत्लेआम ने उनकी कितनी मदद कीए यह चिंतन का विषय है।
गुजरात हिंसा में मोदी की स्पष्ट भूमिका के चलते, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मोदी को मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते थे। परन्तु आडवाणी ने मोदी की कुर्सी बचा ली। मोदी को बढ़ावा देने में भी आडवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। आडवाणी के मोदी प्रेम के पीछे कोई व्यक्तिगत कारण नहीं था। इसका कारण यह था कि दोनों स्वयंसेवकों के राजनैतिक एजेण्डे एक थे। मोदी और आडवाणी, दोनों ने मिलकर देश की धमनियों में साम्प्रदायिकता का जहर प्रवाहित करने के लिए हर संभव काम किया। ये दोनों स्वयंसेवक, आरएसएस के हिन्दू राष्ट्र के वफादार सिपाही हैं।
भाजपा को 1984 में लोकसभा में दो सीटें मिलीं थीं। वहां से आडवाणी बाबरी ध्वंस के बाद हुए चुनाव में पार्टी की सदस्य संख्या को 161 तक ले गए। सन् 1999 के चुनाव मेंए साम्प्रदायिक धु्रवीकरण में और वृद्धि के चलते, भाजपा को इतिहास में सबसे ज्यादा.182.लोकसभा सीटें प्राप्त हुईं। आडवाणी की साम्प्रदायिक राजनीति ने भाजपा को पहले प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा दिलाया और तत्पश्चात केन्द्र में सत्ता। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन ने लगभग 6 साल तक दिल्ली में गद्दी सम्हाली। आडवाणी, राजनीति के अत्यंत चतुर खिलाड़ी हैं। वे जानते थे कि उनकी विघटनकारी राजनीति के चलते, अन्य राजनैतिक दल भाजपा के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए अपने साथी स्वयंसेवक, अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आगे बढ़ाया। वाजपेयी का एजेण्डा भी हिन्दू राष्ट्र ही था परन्तु फर्क सिर्फ यह था कि उनकी छवि एक मध्यमार्गी, नर्म नेता की थी।
वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल के बाद आडवाणी में भी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा जागी और इसे पूरा करने के लिए उन्होंने भी अपनी छवि को मध्यमार्गीय कलेवर देने की कोशिश शुरू की। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के इस अघोषित नेता ने पाकिस्तान की संविधान सभा में 11 अगस्त 1947 को मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा दिए गए भाषण को उद्धृत करते हुए जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष नेता घोषित कर दिया। केवल एक भाषण के आधार पर जिन्ना का आंकलन करना निश्चित रूप से अनुचित है। हम यह कैसे भूल सकते हैं कि जिन्ना, मुस्लिम लीग के मुखिया थे और उन्होंने ही द्विराष्ट्र सिद्धांत को मजबूती दी थी। द्विराष्ट्र सिद्धांत से उद्भूत साम्प्रदायिक विचारधारा, हिन्दू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के साम्प्रदायिक तत्वों को प्रिय थी। जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताकर आडवाणी शायद कुछ ज्यादा ही बोल गए। क्योंकि तब तक संघ परिवार ने हिन्दुओं को ष्जिन्ना और मुसलमानों से नफरत करो के आधार पर धु्रवीकृत कर लिया था। ऐसे में आडवाणी के इस बयान को संघ पचा नहीं सका और उन्हें पद से हटा दिया गया। आडवाणी की बढ़ती उम्र के कारण भी आरएसएस उन्हें हटाना चाहता था परन्तु किसी नए, विश्वसनीय चेहरे के अभाव में, सन् 2009 के आम चुनाव में आडवाणी को एक बार फिर पुनर्जीवन मिल गया।
भाजपा की कमान मोदी के हाथों में सौंपने के लिए आरएसएस बहुत इच्छुक नहीं था क्योकि संघ व्यक्तियों की बजाए संगठन की प्रधानता चाहता है। जहां तक मोदी का सवाल है, वे संगटन पर हावी हो जाते हैं। परन्तु मोदी के मामले में आरएसएस, अन्ततः, शायद इसलिए राजी हो गया क्योंकि मोदी ने अत्यंत कुशलतापूर्वक गढ़े गए प्रचार अभियान और गुजरात कत्लेआम की सहायता से, गुजरात में जबरदस्त साम्प्रदायिक धु्रवीकरण करने में सफलता पाई थी। आरएसएस की राजनीति, मूलतः, धार्मिक पहचान के भेस में पूर्ण एकाधिकारवाद की राजनीति है। यह एक तरह की फासीवादी राजनीति है। फासीवादी राजनीति के लिए जरूरी होता है एक करिश्माई जननेता। मोदी इस तरह के नेता हैं और इस राजनैतिक मजबूरी के चलते, मोदी के बारे में अपनी आपत्तियों को दरकिनार कर, आरएसएस ने उनके कद में हो रही अनियंत्रित वृद्धि को स्वीकार कर लिया।
इस राजनैतिक प्रहसन के चलते, मोदी की विघटनकारी छवि के कारणए एनडीए के गठबंधन के साथी भाजपा से दूर जा रहे हैं। इन दलों को अपने अल्पसंख्यक वोट बैंक को ध्यान में रखना है और इसलिए वे मोदी के नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर सकते। एनडीए से पहले ही कई दल बाहर जा चुके हैं और मोदी युग के उदय के बाद कई और दल एनडीए का साथ छोड़ सकते हैं। सम्भावना तो यही है कि अन्ततः भाजपा के साथ केवल हिन्दुत्ववादी शिवसेना और साम्प्रदायिक अकाली दल रह जाएंगे। आडवाणी ने विद्रोह का झण्डा उठाया अवश्य परन्तु आरएसएस प्रमुख के एक फोन ने उनके तेवर ठंडे कर दिए। आरएसएस द्वारा प्रशिक्षित स्वयंसेवक, नागपुर से आए निर्देशों का किसी भी स्थिति में उल्लंघन नहीं कर सकते। इसके कई कारण हैं। पहला यह कि स्वयंसेवकों को यह सिखाया जाता है कि मूलतः उनकी वफादारी संघ और हिन्दू राष्ट्र के प्रति है। हम सबको याद है कि जब 1977 में आपातकाल की समाप्ति के बादए भाजपा के पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हो गया था, तब जनता पार्टी के अन्य घटक दलों ने जनसंघ के सदस्यों से आरएसएस से उनके संबंध तोड़ने को कहा था। जनसंघ ने जनता पार्टी को तोड़ना बेहतर समझा बजाए आरएसएस से संबंध तोड़ने के। अटल बिहारी वाजपेयी, जो कि तथाकथित मध्यममार्गी और नरम नेता बताये जाते हैं ने भी अमेरिका के स्टेटन आईलैण्ड में अनिवासी भारतीयों की एक सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था कि वे स्वयंसेवक पहले हैं, प्रधानमंत्री बाद में।
विचारधारात्मक कारकों के अलावा, चुनावी कारक भी आरएसएस के वर्चस्व के पीछे हैं। भाजपा की मुख्य शक्ति हैं आरएसएस के स्वयंसेवक, जो भाजपा के उम्मीदवारों को चुनाव जितवाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। भाजपा के कार्यकलापों पर आरएसएसए संगठन मंत्रियों द्वारा कड़ा नियंत्रण रखता है। ये संगठन मंत्री, भाजपा में, आरएसएस के प्रतिनिधि होते हैं। राम मंदिर मुद्दे के जोर पकड़ने, आडवाणी की विघटनकारी रथयात्रा, उसके बाद हुई हिंसा और साम्प्रदायिक धु्रवीकरण और इन सब से हिन्दुत्व की राजनीति को हुए लाभ से आरएसएस काफी प्रसन्न था। अब स्थिति यह हो गई है कि भाजपा की ताकत में दिन ब दिन गिरावट आ रही है और क्षेत्रीय पार्टियां मजबूत होती जा रही हैं। इन क्षेत्रीय पार्टियों को मुख्यतः केवल क्षेत्रीय मुद्दों से मतलब रहता है और इसलिए चुनाव के बाद वे किस करवट बैंठेंगी, यह कहना बहुत मुश्किल  है।
इस पूरे घटनाक्रम से मुख्यतः दो चीजें साफ होती हैं। पहली यह कि मोदी, समाज को धु्रवीकृत करने में काफी हद तक सफल रहे हैं। ऐसा माना जा रहा है कि मोदी स्वभाव से तानाशाह हैं और जब वे सत्ता में आते हैं तो सारी शक्तियां स्वयं में केन्द्रित कर लेते हैं। उनके इस तानाशाहीपूर्ण चरित्र को उनका शक्तिशाली होना बताया जा रहा है। गुजरात की अन्य पार्टियों के नेता तो मोदी के इस आंकलन से सहमत हैं ही कई पूर्व भाजपा नेताओं को भी मोदी ने हाशिए पर पटक दिया है। उनकी कोई पूछ परख नहीं हैं। मोदी को सत्ता से बाहर रखने में क्षेत्रीय पार्टियां किस हद तक आवश्यक भूमिका निभाएंगी, यह कहना मुश्किल है। इन पार्टियों की सिद्धान्तो और मूल्यों में कोई खास श्रृद्धा नहीं है।
जब सन् 1996 में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी तब कोई दूसरी पार्टी उसके साथ गठबंधन करने को तैयार नहीं थी। परन्तु कुछ ही साल बाद, कई दल सत्ता के लोभ में भाजपा के आसपास मंडराने लगे थे। संघ.भाजपा.मोदी इसी ऐतिहासिक अनुभव के आधार पर आश्वस्त होंगे कि समय आने पर उन्हें दूसरी पार्टियों का समर्थन मिल जायेगा। यह अपेक्षाकृत कठिन है क्योंकि उस समय वाजपेयी की उपस्थिति के कारणए अन्य पार्टियों के लिए स्वयं को धोखे में रखना आसान था। वे सत्ता में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करते हुए यह दावा भी कर सकती थीं कि उन्होंने अपने सिद्धांतो से कोई समझौता नहीं किया है।
आज धर्मनिरपेक्ष आन्दोलन के सामने बहुत कठिन चुनौती है। समाज में धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध पूर्वाग्रह जड़ पकड़ चुके हैं और अल्पसंख्यकों की हालत दिन ब दिन द्वितीय श्रेणी के नागरिकों जैसी होती जा रही है। मोदी के सत्ता में आने के अभी तो कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं परन्तु यह साफ है कि संघ और भाजपाए सत्ता में आने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। हमने पहले भी देखा है कि साम्प्रदायिक हिंसा से साम्प्रदायिक संगठनों को ताकत मिलती है। साम्प्रदायिक संगठन यह बात अच्छी तरह से समझते हैं। यह सब देश के लिए बहुत खतरनाक है। धार्मिक हिंसा के कारण साम्प्रदायिक ताकतों की जमींनी स्तर पर ताकत बढ़ रही है। जहां तक क्षेत्रीय पार्टियों के राष्ट्रव्यापी गठबंधन का सवाल है उसमें सत्ता सुख का उपभोग करने की इच्छा रखने वालों की संख्या इतनी अधिक होगी कि उसका अस्तित्व बहुत दिनों तक बना नहीं रह सकेगा। क्या तीसरे मोर्चें के लिए कोई गुंजाइश है? क्या सभी गैर.भाजपा और गैर.कांग्रेस दल एक साथ मिलक, तीसरा मोर्चा बना सकते हैं?तीसरा मोर्चा केवल प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और गरीबों की पक्षधरता वाले कार्यक्रमों के आधार पर बनाया जा सकता है। एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी होगा कि तीसरे मोर्चे का नेतृत्व कौन करे? मोदी जैसे फासिस्ट व्यक्ति और आरएसएस जैसे घोर साम्प्रदायिक संगठन का प्रजातांत्रिक तरीकों से कड़ा विरोध किया जाना जरूरी है।
-राम पुनियानी

सीदी मौला



सीदी मौला एक ऐसा चरित्र जो भारत के मध्यकाल में ठगी , चोरी और डकैती करके भी पूरे उत्तर भारत में अपने को संत कहलवाता था | ऐसे लोगो के कारण किसी  भी धर्म या समाज  की मान्यताये टूटकर बिखरती है |
भारत का शायद ही कोई गाँव या शहर होगा जिस में किसी साधू , संत , पीर या फकीर ने अपना डेरा न
जमा रखा हो , धन यश खाने के लिए तर  --  माल , वासनापूर्ति के लिए युवती चेलिया तो मिलती ही है | उस पर मजे की बात यह है कि लोग '' महाराज जी ' '' गुरु जी '' कहते हुए पैरो में झुकते चले जाते है |
साधू संत बनने के लिए किसी योग्यता की भी आवश्यकता नही , केवल सिर मुडाने , या जटा बढाने और भगवे कपडे रंगने के जरूरत है , ऐसे लाखो रंगे सियार मध्यकाल में भी थे और आज भी है |
                         संभव है इन लाखो संत , फकीरों में दो चार सत्पुरुष विद्वान् भी हो , पर निश्चय ही ज्यादा भीड़ तो मुर्ख , नशेबाज , पाखण्डियो की ही होती है | मध्ययुग में तो इन का खूब प्रभाव था -- सुलतान और उसके आमिर तक इनका आदर करते थे , फिर जनसाधारण का तो कहना ही क्या ?
कभी -- कभी ये धूर्त रंगे सियार ऐसे अपराध भी कर बैठते या रासलीला फैलाते की आम जनता लुटी सी बस
देखती रह जाती | आये दिन ये पाखंडी लोग कोई ना कोई गुल जरुर खिलाते रहते थे सीदी मौला उसी जमाने का एक भारी मक्कार धूर्त  और रंगा सियार था , जिसकी मान्यता उस समय सारे उत्तर भारत में फैली हुई थी | लेकिन सच्चाई कुछ और ही थी |
दिल्ली और उस के आसपास के इलाको में सीदी की ऋद्दी सिद्दि और चमत्कारों की बड़ी धूम थी , मौला उत्तर पश्चिमी सीमाप्रांत का निवासी था और सुलतान बलबन के समय दिल्ली में आ बसा था , उसने अपने लम्बे जीवन में बलबन और उस के उत्तराधिकारियों का शासन देखा था और अब खिलजी वंश के सुलतान
जलालुद्दीन खिलजी के शासन काल में भी उसकी प्रतिष्ठा पूर्ववत बनी हुई थी |
                                गुलाम वंश के ध्वसावशेषो पर अब जलालुद्दीन ने खिलजी वंश की नीव रखी तो बलबनी
दरबार के कितने आमिर , जागीरदार और सरदार बेघर -- बार हो गये थे | इस क्रान्ति की आंधी ने बड़े -- बड़े सुदृढ़ स्तम्भ गिरा दिए थे | पर इस सीदी मौला के वैभव में कोई अंतर नही आया था | सीदी मौला के वैभव और ऐश्वर्य का कोई अंत नही था | उसके निवास स्थान पर हर समय लोगो की भीड़ लगी रहती थी , भिन्न --
भिन्न कामनाओं को लेकर लोग वह आते थे | आम लोगो का विश्वास था की इस महान संत की वाणी सिद्द है , वह अपने मुख से जो कुछ कह देता वह सत्य उतरता था |दुनिया भेड़ --  चाल पर चलती है , जल्दी ही सीदी मौला के चमत्कारों की कहानी चारो ओर फ़ैल गयी | लाखो लोग उस पर श्रद्दा रखते थे , एक बात तो प्रत्यक्ष थी | सीदी मौला हजारो रूपये खर्च कर के लोगो को खूब अच्छा खिलाता - पिलाता था | जल अथवा स्थल मार्ग से जो यात्री उसके खानगाह पर पहुच जाता वह बिना कुछ खर्च किये उत्तम भोजन प्राप्त करता था | उसके दस्तरखान पर नाना प्रकार के वे व्यंजन चुने जाते थे जो बड़े बड़े खान और अमीरों को भी सुलभ न थे | यह भी एक कारण था की उसके दरवाजे पर हर समय भीड़ लगी रहती थी | हर महीने हजारो मन मैदा 500 जानवरों का मांस 200 या 300 मन खांड 100 या 200 मन मिसरी खरीदी जाती थी | आटा , दाल , घी , सागभाजी , ईधन की कोई गिनती न थी | सीदी मौला का स्थान बेकार , आलसी , पेटू , निक्कमे और जाहिल लोगो का स्वर्ग बन गया था |
दिन में दो -- दो बार उत्तम प्रदार्थ लोगो में बाटे जाते थे | लोगो को इस बात पर बड़ा आश्चर्य होता था की सीदी मौला के पास इतना धन कहा से आता है , रोज हजारो सिक्को का खर्च था , वह मुफ्त भोजन ही नही बाटता था बल्कि अमीर गरीब सभी को कभी -- कभी मौज में आकर शुद्द चांदी के सिक्के भी बाटता था |
यहाँ सोने चांदी की कीमत ईट- पत्थरों से अधिक नही थी | किसी व्यापारी अथवा जरूरतमंद आदमी को उसका धन चुकाने का तरीका भी बहुत अजीब था | वह अक्सर उनसे कह देता था , '' जाओ , फला पत्थर या पेड़ के नीचे इतने रूपये दबे हुए है '' |
सचमुच वह उन्हें उतने रूपये मिल जाते , इस तरह से उसकी ख्याति और ज्यादा फ़ैल जाती | सच्चाई यह थी की मौला या उस का कोई चेला वहा  पहले ही धन दबा आता था  , इस पर भी तुर्रा यह की उसने कभी किसी से कुछ स्वीकार नही किया | सुलतान के बड़े बड़े अमीर उसके सामने थैलिया लिए खड़े रहते , उसके धनी व्यापारी शिष्य अपनी  तिजोरिया खोले रहते पर सीदी मौला ने कभी किसी से कुछ भी स्वीकार नही किया |                                     दिल्ली के सुलतान से लेकर साधारण भिखारी तक सभी लोग उसके वैभव और शाही
खर्च पर चकित थे | जनसाधारण का विश्वास था की सीदी को कीमियागिरी ( सोना बनाने की विधा ) का ज्ञान है , वह हर रात अथाह सोना बना लेता है |यह बात सच भी थी | सीदी मौला हर रात लाखो रुपयों का सोना चांदी बना लेता था , लेकिन कीमियागिरी से नही बल्कि ठगी , चोरी और डकैती से , वह सीमाप्रांत का धूर्त  और पक्का ठग था , उसने दिल्ली में अपने पाखंड का ऐसा जाल फैला रखा था की उसकी ठगी , चोरी और धूर्तता का कुछ पता ही नही चलता , वह चोरो और ठगों का गुरु या सरदार था | उसके सभी साथी ठग , चोर डाकू इतने कुशल और घुटे थे की पकड़ में ही नही आते थे | यदि उसके गिरोह में से कभी कोई पकड़ भी लिया जाता तो सीदी मौला अपने प्रभाव से उसे छुडवा लेता  | कयोकी दिल्ली का सबसे बड़ा काजी जलाल काशनी उसका अपना साथी और अव्वल दर्जे का बदमाश था | वह काजी इस गिरोह के फसने वाले आदमियों को कोई न कोई तिकड़म भिडाकर सजा से बचा लेता था |                                           इस तरह सीदी मौला ने अपनी ठगी का ऐसा अटूट जाल फैलाया हुआ था की उसके फकीरी लिबास , पाखंड और सब को मुफ्त भोजन बाटने के ढोंग के पीछे उसके सारे कुकर्म छिपे रहते इस शक्तिशाली गिरोह में केवल चुने और परखे हुए ठग , चोर और डाकू ही भर्ती किये जाते थे | ये लोग चोरी का माल अपने महान गुरु के चरणों में अर्पित कर देते थे | इस गिरोह की एक रात और एक दिन की कमाई एक लाख रूपये से कम न थी |
मौला ठगी और चोरी के माल में से कुछ अंश इन साथियो को बाट देता था और शेष को अपने खजाने में दाल लेता | इस गिरोह ने सारे उत्तर भारत में तहलका मचा रखा था | पाप की सारी कमाई खिंच -- खिंच कर सीदीमौला के पास जमा होने लगी थी |
इन लोगो पर किसी कानून की छाया भी न पड़ती थी धर पकड़ के भय से मुक्त ये लोग निर्भय होकर अपनी '' कला '' का चमत्कार दिखाकर प्रजा को लुटते रहते थे | मौला के आश्रम में दिल्ली के सुलतान की भी एक न चलती  थी | जनसाधारण इस रंगे सियार और मक्कार ठग के असली रूप से परिचित न था | उसकी ख्याति एक सच्चे फकीर के साथ -- साथ महादानी के रूप में फ़ैल रही थी |
यह धूर्त व्यक्ति दिन में साधारण वस्त्र पहने कुरान के पाठ , नमाज , रोजा आदि में लींन  रहता था | लेकिन रात आते ही उसकी जिन्दगी शाही ठाठ बाट आनंद भोग , बिलास सुरा सुंदरी की संगती में बीतती थी | यही उसकी असली जिन्दगी थी | यही उसका असली रूप था , लेकिन इस रूप से उसके कुछ विश्वस्त चेले ही परिचित थे |
भारतीय जनता का सबसे बड़ा दोष है -- उसका अन्धविश्वास , यहाँ का जनसाधारण तर्क से काम न लेकर अंधश्रद्दा व भावना से प्रेरित होकर चलता है , वास्तविकता से आँखे बंद करने के कारण जब तब ठोकर खाकर गिर भी पड़ता है \
ये धूर्त साधू दान दक्षिणा के रूप में इनकी अंधश्रद्दा के बल पर खूब गुलछर्रे उड़ाते है | यहाँ तक की लोग अपने बच्चो को दूध , दही , फल आदि न देकर इन  वैरागी संतो को चढा आते है |
यह घृणित रीति मध्यकाल में और बुरी तरह प्रचलित थी | सीदी मौला की तरह के धूर्त इनके भरोसे खूब मौज करते थे | मौला के पाखंड का अड्डा जमने से कुछ वर्ष पहले की बात है , एक बार जब वह सीमा प्रान्त की ओर से दिल्ली आ रहा था तो अजोधन में अपने समय के प्रसिद्द सूफी संत शेख फरीद के दर्शनों के गया | मौला ने अपना सिर भक्तिभाव से इस महान तपस्वी के चरणों में रख दिया |
उसकी ओर ध्यान से देखते हुए शेख फरीद ने उसे अमूल्य शिक्षा दी  थी , ऐ सीदी , तू उस दिल्ली में जा रहा है जो हिन्दुस्तान के सुल्तानों और अमीरों की राजधानी है , यह नगरी राजनितिक कपटजाल  , उखाड़ पछाड़  , षड्यंत्र और हत्याओं से भरी हुई जगह है | इसमें तू साधना करना चाहता है , तेरी मर्जी , लेकिन एक बात याद रखना , दिल्ली जाकर वह  की आम जनता का दिल जीतना , पर खबरदार यहाँ के शहजादों अमीरों , खानों मलिकों और शाही मुलाजिमो से हेलमेल मत रखना , जहा तक तुझ से हो सके इनके दरवाजे पर मत जाना और इन्हें अपने दरवाजे पर मत फटकने देना | नही तू भारी मुसीबत में पड़ जाएगा , यदि ये लोग तेरे पास आने जाने लगे तो भी इनसे बातचीत हरगिज  मत करना , यदि तू बातचीत भी करे तो राजनितिक मामलो पर तो भूल कर भी चर्चा , इनके साथ किसी षड्यंत्र में हिस्सा मत लेना |
'' एक बात और याद रखना , फकीर तो बस फकीर  ही होता है , उसके लिए सोने चांदी के टुकड़ो पर गिरना शोभा नही देता है , ऐ सीदी , याद रख , जब पास में जरूरत से ज्यादा धन इकट्ठा हो जाता है तो दिमाग में घुन लगा देता है | यदि तूने फकीरी लिबास ओढ़ कर सोना चांदी जमा किया तो तू बर्बाद हो जाएगा , यदि तूने मेरी सीख  मान ली तो तेरी प्रतिष्ठा बढ़ेगी | यदि तूने दिल्ली के राजनितिक दलदल में कदम भी रखा तो उमे फंस कर तडप -- तडप कर मरेगा तेरी हड्डी तक का पता न लगेगा , फकीरों और दरवेशो को राजपाट के इन झंझटो से जहा तक हो सके दूर ही रहना चाहिए | इसी में उनकी शान है , इसी में उनकी इज्जत है |
सीदी मौला ने सूफी संत का उपदेश सूना और उस पर अमल करने का आश्वासन दिया | वह दो तीन दिन शेख फरीद  के आश्रम में रहा | फिर दिल्ली आ पंहुचा | इस माया नगरी के ऐश्वर्य की चकाचौध ने उसे पागल बना दिया | लूट खसोट के दबे संस्कार भड़क उठे और धीरे -- धीरे उसने बड़ी सावधानी से अपना पाखंड जाल पूरी तरह फैला दिया | एक सिद्ध फकीर और महान दानी के रूप में उसकी ख्याति फैलने लगी अर्थात उसके छ्टे हुए चेलो ने फैला दी |
उसके दरवाजे पर बलबनी और खिलजी अमीर हाथ -- बांधे  खड़े रहते थे , जब तक बलबन जीवित रहा तब तक उसके दबदबे , आतंक , कुशल प्रशासन मजबूत जासूस व्यवस्था से सहम कर सीदीमौला ने अपने पंख नही निकाले थे | वह फूंक फूंक कर कदम रखता था , लेकिन बलबन के मरने के बाद दयालु सुलतान जलालुद्दीन के शिथिल शासन में उसने अपना खूब रंग जमाया |
बलबन के दरबारी अमीरों को कभी उसने पचास --  पचास हजार तक चांदी के सिक्के भेट किये थे | पर फिर भी वे अपने सशक्त स्वामी के भय से उसकी ओर आँखे उठा कर भी नही देखते थे | लौह पुरुष बलबन का शासन बड़ा दृढ था | उसने चोर डाकू और ठगों को जड़ से मिटा दिया था | लेकिन यह रंगा सियार सीदी मौला फकीरी वेश के कारण उसकी नजर में चढने से बच गया था | बलबन के मरते ही दुर्बल सुलतानो के समय उसका धंधा खूब चमका | वह अनाप  -- शनाप खर्च करता था | चोर डाकुओ का सबसे बड़ा सरदार ख़ास राजधानी में सुलतान की नाक के नीचे एक दरवेश के वेश में पूजा जाता था | उसके साथी निडर होकर प्रजा को लुटते रहते थे |
जलालुद्दीन के शासन काल ( 1290 -- 96 )
में सीदी मौला की प्रसिद्दी अपनी चरम सीमा तक पहुच चुकी थी | उसके प्रभाव में अत्यधिक वृद्दि हुई | सुलतान का बड़ा पुत्र खानखाना मौला का बहुत बड़ा भक्त और प्रशंसक था | सीदी उसे अपना पुत्र कहा करता था , सुलतान जलालुद्दीन खिलजी के बड़े -- बड़े मलिक और अमीर वहा  आया जाया करते थे | दिल्ली का प्रधान
काजी जलाल काशानी मौला का विश्वस्त साथी था | यह काजी काफी रात गये तक मौला के साथ एकान्त में गुपचुप बाते किया करता था |
सीदी मौला के चेलो द्वारा ठगी , चोरी और डकैती के कारण उसके गुप्त खजाने में सैकड़ो मन सोना चांदी , करोड़ो रूपये और मनो हीरे , मोती जवाहरात  इकठ्ठे हो गये थे | यह खजाना सुलतान के शाही खजाने से टक्कर ले रहा था , धीरे -- धीरे इस अथाह खजाने की गर्मी उसके दिल और दिमाग पर असर करने लगी , उसके मन में दिल्ली का खलीफा बनने का विचार आया , वह अपने वैभव से बगदाद के खलीफा  को भी पछाड़ देना चाहता था | इस महत्वाकाक्षा  की पूर्ति के लिए उसने योजना बनानी आरम्भ कर दी  , उसने अपने विश्वस्त साथियो से विचार  -- विमर्श किया योजना आगे बढने लगी |
जब सुलतान जलालुद्दीन खिलजी ने जून १1290 ई. में दिल्ली के सिहासन को हस्तगत किया और खिलजी वंश की नीव रखी तो बलबन के समय के बहुत से अमीर , मलिक , जागीरदार इस नये राज्य में दरिद्र हो गये थे | नये सुलतान ने उन के सारे इलाके और जागीरे छीन कर अपने विश्वस्त और वफादार साथियो को बाट दी |
अब बलबनी अमीरों के पास कोई इलाका नही बचा था |, वे दर - दर के भिखारी बन गये थे और सीदी मौला के खानगाह से भोजन पाकर किसी तरह अपने दिन काट रहे थे |
सीदी मौला के लिए इन पदच्युत आमिर और मलिकों से बढ़कर अच्छे सहायक और कहा मिल सकते थे , कयोकी अपनी जागीरे छीन जाने से इन के मन में खिलजियो के प्रति घृणा थी और बदला लेने की ताक में थे | वे सहज में ही सुलतान के खिलाफ षड्यंत्र में फंस गये |
दिल्ली का कोतवाल विरजतन और हतिया पायक बलबनी शासन में बहुत बड़े पहलवान माने जाते थे और इन को लाखो जीतल वेतन मिलता था , लेकिन खिलजियो के राज्य में वे दाने -- दाने को मोहताज हो  गये थे | ये लोग सीदी मौला के पास आने -- जाने लगे | पदच्युत अमीर और बहिष्कृत जागीरदार व मलिक तो यहाँ पहले से आते जाते थे | ये लोग और ठिकाना न होने से रात को वही सो जाते थे | सामान्य लोग यही समझते थे की संत के प्रति श्रद्दाभाव वश ये लोग दर्शन करने आते जाते है |
दयालु  सुलतान जलालुद्दीन खिलजी के विरुद्द अब बड़ी  तेजी से षड्यंत्र शुरू हो गया | सीदी मौला के नेतृत्व में बलबनी मलिक और अमीर , प्रधान काजी जलाल काशानी , दिल्ली का कोतवाल विरजतन  और हतिया पायक जैसे लोग सारी --  सारी  रात बैठकर सुलतान की हत्या करने की योजना बनाने लगे |
बहुत विचार - विमर्श के बाद योजना का अंतिम रूप इस प्रकार स्थिर हुआ ---
जुमे के दिन जब सुलतान खिलजी घोड़े पर सवार होकर निकले तो फसादियो की तरह उस पर हमला करके उसकी हत्या कर दी जाए | और फिर सीदी मौला को राजगद्दी पर बैठा कर दिल्ली व पूरे हिन्दुस्तान का खलीफा घोषित कर दिया जाए | साथ ही दिवगंत सुलतान नासिरुद्दीन की बेटी से उसकी शादी कर दी जाए | काजी जलाल काशानी को '' काजिखान '' की उपाधि देकर मुलतान की सुबेदारी देना निश्चित हुआ | बलबनी
दरबार के दूसरे अमीर  और मलिकों को भी जहा तहा सूबे और इलाके जागीर में देने निश्चित हुए |
इस षड्यंत्र में एक बहुत बकवादी और लालची आदमी भी शामिल था | जब मौला अपने चेलो को हिन्दुस्तान के सूबे बाट रहा था तो इस आदमी को जागीर में अपनी मनपसन्द का इलाका न मिला जिससे वह नाराज हो गया | उसने सुलतान जलालुद्दीन के पास जाकर इस सारे षड्यंत्र का  भंडाफोड़ कर दिया |
सुलतान के कानो में इस आशय की खबरे जासूसों द्वारा पहले पहुच गयी थी की सीदी मौला का निवास स्थान बलबनी दरबार के मलिक और अमीरों का अड्डा बना हुआ है | और कई कुख्यात डाकू वहा आते -- जाते देखे गये है , वह मामले को समझ नही पाया था पर अब सारी बात उसके दिमाग में बैठ गयी |
एक दिन सुलतान जलालुद्दीन स्वंय वेश बदलकर उसके निवास स्थान पर गया वह उसने स्वंय अपनी आँखों से इन षड्यंतकारियों को संदेहजनक स्थिति में घूमते और सीदी मौला से गुपचुप बाते करते देखा था | दूसरे दिन उसने अपने सैनिको  को भेजकर इन सब धूर्तो और षड्यंत्रकारियों के साथ सीदी मौला को कैद कर लिया | मौला की गिरफ्तारी से सारी  दिल्ली में सनसनी फ़ैल गयी , मौला पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया | अगले दिन दरबार में इन सब षड्यंत्रकारियों की पेशी हुई | जब सुलतान ने अपनी हत्या का षड्यंत्र रचने और विद्रोह करने के विषय में पूछा तो उन्होंने इन आरोपों से साफ़ मना कर दिया | उन दिनों मार मारपीट कर अपराध स्वीकृत कराने का कोई कानून न था | इसीलिए सुलतान उससे सत्य न उगलवा सका |
सब कुछ जानते हुए भी वह उन्हें कानून के अनुसार दंड नही दे सका | ये भयंकर षड्यंत्रकारी और राजद्रोही किसी प्रबल प्रमाण के अभाव में यो ही बेदाग छूटे जा रहे थे |
सुलतान बड़े चक्कर में पड़ गया , वह चाह कर भी इन दुष्टों को कोई दंड नही दे पा रहा था  उसे परेशान देखकर कुछ वजीरो ने कहा , '' यदि ये व्यक्ति सचमुच निर्दोष है तो इनकी अग्नि परीक्षा ली जाए ''|
सुलतान को यह सुझाव बहुत पसंद आया , सीदी मौला तथा दूसरे धूर्तो की अग्नि परीक्षा के लिए अगले दिन प्रात: काल  का समय निश्चित हुआ |
दिल्ली में यदि सबसे सरल कोई काम है तो भीड़ इकठ्ठा करना | यदि कोई चूहा ही कुचल कर मर जाए या कोई यो ही मौज में आकर चीख पड़े तो एक मिनट में सौ दो सौ आदमी उसके आसपास इकठ्ठे हो जायेगे | फिर यदि किसी साधू -- सन्यासी की करामात की बात हो तो कहना ही क्या लाखो लोग तमाशा देखने के लिए टूट पड़ेगे |
दिल्ली की तरह भारत के अन्य नगरो में भी  यह मनोवृति देखने को मिलती है | मजमा लगाने वाले इसी भीड़ की बदौलत पेट पालते रहे है | सीदी मौला के मित्र और शत्रु सभी उसकी अग्नि परीक्षा का द्रश्य देखने के लिए आतुर हो उठे , कुछ लोग कहते थे की '' आग मौला का कुछ नही बिगाड़ सकती , दूसरे कहते थे जरा सुबह
होने दीजिये देखते है क्या होता है |
अग्नि परीक्षा का मसाचार आंधी की तरह दिल्ली तथा आसपास के इलाको में फ़ैल गया , हजारो लोग इस दुर्लभ दृश्य को देखने के लिए भारपुर के मैदान की ओर उमड़ पड़े , जहा बहुत बड़ा अलाव जलाया जा रहा था , मैदान में एक ओर शाही शामियाना लगाया गया , सुलतान , उसके खान , मलिक , अमीर तथा दूसरे दरबारियों के लिए उपयुक्त स्थान बनाये गये |
सुलतान यथा समय अपने दरबारियों के साथ मैदान में पंहुचा , लाखो लोग उत्सुकता से इस दृश्य को देखने के लिए जमा हो गये थे | सेना का पूरा प्रबन्ध वातावरण में सन्नाटा और बेचैनी थी | बहुत बड़े अलाव से आग की लपटे निकल रही थी  कोयले दहक रहे थे , सीदी मौला और उसके चेले जंजीरों से जकड़े हुए एक ओर खड़े धडकते दिल से आग के शोलो की ओर देख रहे थे , सुलतान ने अपराधियों की सच्चाई परखने के लिए
उन्हें आग में डालने के सम्बन्ध में वह बैठे हुए आलिमो , उलेमाओं से फतवा माँगा |  अब अग्नि परीक्षा के लिए फतवा देने के सम्बन्ध में आलिमो में विचार विमर्श हुआ और सभी ने सर्वसम्मति से सुलतान को अपना यह निर्णय दिया , '' अग्नि परीक्षा शरा ( मुस्लिम कानून ) के विरुद्द है , अग्नि का गुण जलाना है और जिस प्रदार्थ का गुण जलाना हो , उसके द्वारा झूठ और सच की पहचान नही हो सकती है , फिर इतने लोगो के षड्यंत्र का हाल केवल एक व्यक्ति जानता है , इतने बड़े अपराध में केवल एक व्यक्ति की गवाही शरा की दृष्टि में विशेष महत्व नही रखती है '' |
आलिमो के इस निर्णय को सुलतान ने स्वीकार कर लिया , उसने अग्नि परीक्षा का विचार त्याग दिया | इस षड्यंत्र के नेता काजी काशानी का तबादला बदायु में कर दिया बलबनी खानजादो और मलिकजादो को खोज खोज कर देश के दूर दूर के हिस्सों में इधर -- उधर भिजवा दिया | सुलतान की हत्या के लिए नियुक्त कोतवाल विरजतन और हतियापायक को कठोर दंड दिया , इन सब दुष्टों को दिल्ली से दूर भेजकर सुलतान ने उनके नेता महा धूर्त सीदी मौला की ओर ध्यान दिया  |सुलतान जलालुद्दीन ने कुपित दृष्टि से इस धूर्त की और देखा |जो अब तक संत के रूप में उत्तर भारत के लाखो लोगो की श्रद्दा का पात्र बन बैठा था | लेकिन खास दिल्ली में डेरा जमाकर हिन्दुस्तान के सुलतान की हत्या करके स्वंय दिल्ली का खलीफा बनने का सपना देख रहा था | सुलतान ने इस पाखंडी को खूब आड़े हाथो लिया और अंत में दुखी होकर अपने पास बैठे अबुबकर सूफी हैदरी तथा उसके साथियो की ओर देखकर बोला "" ऐ दरवेशो , मेरा और इस मौला का न्याय कर दो ''
अबुबकर हैदरी स्वतंत्र और उग्र विचारों का सूफी था और उसके सब साथी भी ऐसे ही थे | सुलतान की बात सुनकर हैदरी का एक शिष्य बहरी बड़ी निडरता से आगे बढ़ा और मौला के पास पंहुचकर उस्तरे था सुए से उसके शरीर को छेद -- छेद कर छलनी कर दिया |
मौला दर्द के मारे तड़प गया , वह बुरी तरह तड़प रहा था पर उस के प्राण नही निकल रहे थे | यह देखकर सुलतान के पुत्र और अमीर अरकलीखान ने अपने महावत को इशारा किया , महावत हाथी को लेकर आगे बढ़ा , महावत का संकेत पाकर उस सधे हुए जंगी हाथी ने खून से लथपथ बुरी तरह घायल मौला को अपनी सूड में उठा लिया , उसे एक बार उपर हवा में  में उछाला , जब वह अधमरा देह नीचे गिरा तो हाथी ने अपने भारी  भरकम पैर  उस पर टिका दिया और फिर उसे बुरी तरह रौद डाला | सबके सब देखते देखते मौला की हड्डिया चकनाचूर हो गयी , मांस के चीथड़े चीथड़े उड़ गये | धरती खून से रंग गयी , दिल्ली का खलीफा  बनने के उसके सपने मिटटी में मिल गये | उस दिन सांयकाल दिल्ली में कालीपीली  आंधी आई , उत्तर भारत में गर्मियों के
मौसम में ऐसी काली पीली आंधिया प्राय: आती ही रहती है | लेकिन मौला के चेलो ने सुलतान को  बदनाम करने के लिए यह बात फैलानी शुरू कर दी कि मौला की हत्या के कारण यह आंधी आई है |
इस वर्ष पूरी बरसात न होने से अकाल की स्थिति पैदा हो गयी थी , लेकिन दयालु सुलतान ने सरकारी अन्न गोदामों के दरवाजे खोल दिए थे |सुलतान ने सरकारी अन्न गोदामों के दरवाजे खोल दी थे कुटिल लोगो ने इस अकाल की स्थिति को सीदी मौला की हत्या के साथ जोड़कर सुलतान की स्थिति कमजोर करने की कोशिश की लेकिन सुलतान की उदारता , दया और करुणा के सामने सब के मुंह बंद हो गये | सारे राज्य में सुलतान और उसके अमीरों की ओर से स्थान -- स्थान पर भोजनालय खोल दिए गये जहा अकाल पीड़ित निर्धनों को मुफ्त भोजन दिया जाताथा | अगले वर्ष खूब अच्छी वर्षा हुई , इतनी अधिक फसल की संभाले न संभली , लोग अकाल और सीदी मौला की मौत को भूल गये |
-सुनील दत्ता
 स्वतंत्र पत्रकार व विचारक                 
-   आभार स . विश्वनाथ

मंगलवार, 18 जून 2013

केन्द्र सरकार का भी दायित्व


  देश के केन्द्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने खालिद मुजाहिद की मौत को हत्या माना है वहीं स्थानीय सांसद व अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ. पी.एल. पुनिया ने खालिद मुजाहिद की मौत की सी0बी0आई0 जाँच की माँग की है।
    प्रदेश सरकार ने सी0बी0आई0 जाँच का अनुरोध केन्द्र सरकार से कर दिया है। अब दोनों मंत्रियों का नैतिक दायित्व बनता है कि केन्द्र सरकार से पैरवी कर सी.बी.आई. जाँच को आगे बढ़ाएँ क्योंकि खालिद मुजाहिद का अपहरण 16 दिसम्बर 2007 को मडि़याहूँ बाजार जनपद जौनपुर से किया गया था, जिसके पर्याप्त दस्तावेजी सबूत भी हैं। आर0डी0 निमेष कमीशन ने भी खालिद मुजाहिद व तारिक कासमी की गिरफ्तारी व बरामदगी को फर्जी माना है। बाराबंकी जनपद में खालिद मुजाहिद के चाचा जहीर आलम फलाही द्वारा लिखाई गई प्रथम सूचना रिपोर्ट की विस्तृत जाँच यदि सी0बी0आई0 द्वारा होती है तो लगभग 150 से अधिक पुलिस में छिपे हुए अपराधियों की पहचान होगी और उन्हें कारागार में निरुद्ध भी होना पड़ेगा। अब देखना यह है कि पुलिस द्वारा निरन्तर उत्पीडि़त उत्तर प्रदेश की अल्पसंख्यक जनता की दोनों मंत्रीगण कितनी सकारात्मक मदद कर सकेंगे।
अखिलेश सरकार की असफलता
      पता चला है कि उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों ने खालिद प्रकरण की सी.बी.आई. जाँच न होने पाएँ इसलिए सी.बी.आई. जाँच का अनुरोध पत्र केन्द्रीय गृह मंत्रालय को निर्धारित प्रोफार्मा पर नहीं भेजा है। अनुरोध पत्र के साथ आवश्यक कागजात जैसे प्रथम सूचना रिपोर्ट, पंचायतनामा, पोस्टमार्टम रिपोर्ट सहित कई आवश्यक दस्तावेज केन्द्रीय मंत्रालय को भेजे ही नहीं हैं। इस तरह अखिलेश सरकार का मुस्लिम मामलों में अपनाए जा रहे रुख का पता चलता है।
     मुस्लिम वोटों की राजनीति खत्म न होने पाए इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार ने बहुत ही चालाकी से सी0बी0आई0 जाँच का अनुरोध मानकर जाँच के लिए केन्द्रीय गृह मंत्रालय को लिख दिया है किन्तु अभी तक केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने खालिद मुजाहिद के अपहरण, अवैध परिरोध, धोखाधड़ी व हत्या के मामले में अधिसूचना जारी नहीं किया है। वहीं दूसरी तरफ डिप्टी एस.पी. जियाउल हक की हत्या के मामले में केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने तुरन्त अधिसूचना जारी कर जाँच प्रारम्भ करा दी थी। लेकिन खालिद मुजाहिद के मामले में केन्द्रीय गृह मंत्रालय टाल मटोल की नीति अपना रहा है जो सत्तारूढ़ दल के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक नहीं होगा। खालिद मुजाहिद व तारिक कासमी की गिरफ्तारी प्रकरण की गंभीरता से जाँच करने पर कचेहरी सीरियल बम विस्फोट काण्ड के वास्तविक अभियुक्तों की पकड़-धकड़ भी संभव हो सकती है और प्रदेश में कुछ भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों द्वारा आतंकवाद के नाम पर जो आतंक व भय का माहौल पैदा किया गया है उस पर लगाम भी लग सकती है।  

रविवार, 16 जून 2013

आने वाली बरबादी से बेखबर

बाराबंकी। आर्थिक उदारीकरण की नीतियों से देश का आम आदमी बुरी तरह प्रभावित हुआ हैं और आश्चर्य की बात यह भी है की वह अपनी आने वाली बरबादी से बेखबर है।
यह बात राम सेवक यादव स्मारक इण्टर कालेज में लोक संघर्ष पत्रिका के तत्वावधान में ’उदारीकरण का प्रभाव आम आदमी पर’ विषय पर मुख्य अतिथि देश के अर्थशास्त्री कमल नयन काबरा ने देश का आर्थिक अंाकलन प्रस्तुत करते हुए कहा कि देश की अर्थव्यवस्था निरन्तर गर्त की ओर जा रही हैं। औद्योगिक प्रगति में गिरावट आ रही है महंगाई का दानव दिन -प्रतिदिन आम आदमी को खाये जा रहा है। विडंबना यह कि आम आदमी चाह कर कुछ नहीं कर पा रहा है देश के प्रमुख राजनीतिक दलो की नीति एवं नियत समान नजर आ रही है। जिस देश में केवल एक अंबानी परिवार्र आिर्थक आय देश की आय का 7 प्रतिशत हो, जिस देश में पूँजीपतियों द्वारा प्रायोजित भ्रष्टचार नए घोटाले कर रहा हो और इन घोटालो से अर्जित धन बाहर के देशो में फर्जी कम्पनियां बना कर वहाॅ खपाया जा रहा हो उस देश में आम आदमी का भविष्य कैसा? इसकी कल्पना आज नहीं की जा सकती है।
    गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे गिरि विकास संस्थान के निदेशक प्रो0 सुरेन्द्र कुमार ने कहा कि उनका संस्थान सरकार द्वारा प्रतिपादित आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन करता है तथा समाजिक समस्याओं का विश्लेषण कर सरकार के सामने अपने सुझाव व प्रस्ताव देता है। देश की स्वतंन्त्रता के पश्चात जवाहर लाल नेहरू द्वारा जो आर्थिक व औद्योैगिक नीतियां बनाई गयी थी उनका आधार सार्वजनिक क्षेत्रो में निवेश पद केन्द्रित था वर्ष1990 तक देश में यही नीतियां चलती रही और हमारा औद्यौगिक विकास एवं औद्यौगिक स्थातित्व इसी का नातिजा था परन्तु वर्ष 1991में अमरीकी दबाव के चलते हमार्री आिर्थक नीतियो में जो परिवर्तन किये गए उन्हे आर्थिक उदारीकरण की संज्ञा दी गयी आर्थिक उदारीकरण केवल विदेशी औद्योगिक इकाईयो की देश में स्थापना एवं विदेशी पूँजी निवेश की राह में लाइसेंस पद्वति के रूप में चली आ रही बाधाओं को दूर करना ही था।
    प्रो0 सुरेन्द्र कुमार ने कहा की वह आर्थिक उदारीकरण के सैद्वान्तिक रूप से विरोधी नहीं है उन्होने जपान का उदाहरण देते हुए कहा कि जापान एक वर्ष 1968 में सर्वप्रथम इन्ही नीतियों को अपना कर अपनी आर्थिक प्रगति अर्जित की थी फिर उसी नक्से कदम पर चलते हुए उसकें पड़ोसी मूल्क चीन ने आर्थिक समृद्वि प्राप्त की और आज विश्व में एक प्रबल आर्थिक शक्ति के रूप में खड़ा हुआ है। हमारे देश में आर्थिक नीतियों का लाभ आम आदमी तक पहुँचाने में  हमारा लोकतंत्रिक ढाँचा अपना वह योगदान नहीं दे पा रहा है जो उसे देना था, जब तक ग्रामिण स्तर पर पंचायत राज व्यवस्था मजबूत और पारदर्शी नहीं होगी तब तक आम आदमी उदारीकरण का लाभ नहीं मिल पायेगा और परिणाम स्वरूप अमीर और गरीब की दूरी बढती जायेगी।
    कार्यक्रम में बृजेश कुमार दीक्षित, वसीम राईन, हुमाँयू नईम खान , विनय कुमार सिंह , श्री राम सुमन, पवन वैश्य, पुष्पेन्द्र कुुमार सिंह बलराम सिंह ,विजय प्रताप, उपेन्द्र, प्रदीप सिंह, विनय दास, अजय सिंह, महंत गुर सरन दास, नीरज वर्मा, निर्मल वर्मा, जावेद, एखलाख एडवोकेट, सूफी  उदैर्वरहमान, जगन्नाथ वर्मा सहित अनेको गणमान्य व्यक्ति थे संचालन रणधीर सिंह सुमन तथा धन्यवाद बृजमोहन वर्मा ने ज्ञापित किया।


सीता हारेगी तो कौन जीतेगा ? नक्सली या सरकार ?

Who will win when SITA will lose? Maoists or the government?सीता की उम्र लगभग सत्रह साल. शाम को अपने घर में बर्तन साफ़ कर रही थी. तभी सलवा जुडूम और सुरक्षा बलों ने गाँव पर हमला बोल दिया. गाँव के लोग जान बचाने के लिये जंगल की तरफ भागने लगे. सीता के माँ बाप भी घर पर ही थे. तभी चार एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारी) ने सीता के घर पर धावा बोल दिया.
एक पुलिस अधिकारी ने सीता की चोटी पकड़ी और घर के भीतर ले कर जाने के लिये घसीटने लगा. सीता के माता पिता ने बेटी को बचाने की कोशिश की. दो पुलिस अधिकारियों ने सीता के माँ बाप को बन्दूक के कुंदे से मार कर गिरा दिया. एक पुलिस अधिकारी ने सीता को पशु की तरह कंधे पर उठा कर घर के भीतर ले जाकर पटक दिया. चारों पुलिस अधिकारियों ने दरवाजा भीतर से बंद कर लिया. बूढ़े माँ बाप दरवाजा पीट-पीट कर अपनी बेटी को छोड़ देने की प्रार्थना करते रहे.
चारों पुलिस अधिकारियों ने सीता से बलात्कार करने के बाद… सीता के कान और नाक में पहने नथ और कुंडल खींच लिये. सीता के पिता ने बैल खरीदने के लिये दस हज़ार रूपये भी घर में पेटी में रखे थे. पुलिस अधिकारियों ने वो रूपये भी लूट लिये. इसके बाद सीता को ज़मीन पर पड़ा छोड़ कर चारों पुलिस अधिकारी अपने अन्य साथियों के साथ दूसरे आदिवासियों के घरों में लूटपाट करने चल दिये.
सीता हिम्मती लड़की थी. उसने अगले दिन अपने पिता से कहा कि मैं इस घटना की शिकायत थाने में कराऊंगी और इन चारों को सजा दिलवाऊंगी. सीता थाने पहुँची. सीता से बलात्कार करने वाले बलात्कारी थाने में ही थे. वे चारों बलात्कारी पुलिस अधिकारी सीता को देखकर थानेदार के पास कुर्सियों पर आ कर बैठ गये. सीता ने अपने साथ घटी बलात्कार की घटना के बारे में थानेदार को बताया. थानेदार हँसने लगा उसके साथ चारों बलात्कारी भी हँसने लगे. थानेदार ने कहा जल्दी यहाँ से भाग जा नहीं तो दुबारा बलात्कार हो जाएगा.
सीता और उसके पिता वापिस आ गये. सीता नी हार नहीं मानी. उसे कहीं से हमारे बारे में पता चला. सीता हमारे आश्रम आयी. हमने सीता की शिकायत पुलिस अधीक्षक को भेजी. पुलिस अधीक्षक ने कार्यवाही तो दूर महीने भर तक कोई जवाब भी नहीं दिया. फिर हम कोर्ट में गये.
कोर्ट ने चारों आरोपी विशेष पुलिस अधिकारियों को अपना पक्ष रखने के लिये समन भेजा. ये चारों आरोपी नहीं आये. कोर्ट ने इन चारों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया. इन चारों के नाम हैं- किच्चे नंदा जो पुलिस अधीक्षक का बाडी गार्ड है. दूसरा है विजय जो कोंटा ब्लॉक कांग्रेस का अध्यक्ष है. मंगल और राजू पुलिस अधिकारी हैं और वे भी थाने की भीतर ही रहते हैं.
सरकार ने कोर्ट में कहा कि ये चारों विशेष पुलिस अधिकारी फ़रार हैं और निकट भविष्य में इनके मिलने की कोई आशा भी नहीं है. अदालत ने केस को अभिलेखागार में बंद करके रखने का आदेश दे दिया.
इधर मैं दिल्ली आकर गृह मंत्री श्री चिदम्बरम से मिला और उन्हें दंतेवाड़ा आकर आदिवासियों की शिकायतें सुनने का सुझाव दिया. चिदम्बरम को मैंने एक सीडी भी सौंपी जिसमे इस बलात्कार कांड का भी ज़िक्र था.
श्री चिदम्बरम के दंतेवाड़ा आकर सीता से मिलने के दो सप्ताह पहले बलात्कारी पुलिस अधिकारी पूरे पुलिस दल बल के साथ सीता के गाँव में आये और सीता और उसकी तीन और बलात्कार पीड़ित सहेलियों समेत उठा कर थाने ले आये. थाने में फिर से वही बलात्कारों का दौर शुरू हुआ जो पांच दिन चलता रहा. इस बार थाने में इन्हें पीटा भी गया और पांच दिन तक खाना नहीं दिया गया.
सीता के गाँव से मुझे फोन आया. मैंने श्री चिदम्बरम को , देश के गृह सचिव को , छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव को , छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक को , दंतेवाड़ा के कलेक्टर को और पुलिस अधीक्षक को फोन पर सूचना दी. मैंने प्रार्थना की कि इन लड़कियों को बचा लीजिए. लेकिन किसी ने इन लड़कियों को नहीं बचाया.
पांच दिन बाद सीता और उसकी तीन सहेलियों को पुलिस ने वापिस लाकर गाँव के चौराहे पर फेंक दिया और गांव वालों को चेतावनी दी कि अब अगर किसी ने हिमांशु से बात की तो पूरे गाँव को आग लगा देंगे.
इसके बाद मैं सीता और उसकी सहेलियों से मिलने उनके गाँव पहुंचा. पुलिस विभाग ने मेरे पीछे एक जीप भर कर पुलिस वाले लगा दिये. गाँव वालों ने रोते हुए हाथ जोड़ कर कहा मैं वापिस चला जाऊं, उन्हें अब मेरी और मदद नहीं चाहिये.
ये बलात्कारी अभी भी खुलेआम नए गावों पर हमले कर रहे हैं. नई लड़कियों के साथ बलात्कार कर रहे हैं. पिछले साल इन लोगों ने फिर से तीन गावों को जला दिया. जब स्वामी अग्निवेश इन जले हुए गाँव वालों के लिये राहत सामग्री लेकर दंतेवाड़ा पहुँचे तो इसी विजय के नेतृत्व में विशेष पुलिस अधिकारियों के दल ने स्वामी अग्निवेश के दल पर हमला किया. बाकी के बलात्कारी भी थाने में ही रहते हैं और नियमित सरकारी वेतन लेते हैं. लेकिन सरकार इन्हें कोर्ट में फरार बताती है.
मैं नहीं जानता सीता और उसकी तीनो सहेलियां अब किस हाल में हैं. पर इस लड़ाई में सीता नहीं हारी बल्कि इस देश के लोकतंत्र ने सीता के सामने दम तोड़ दिया है
- हिमांशु  कुमार 


शनिवार, 15 जून 2013

बलबन शासन का अंत


रजिया बेगम के बाद दिल्ली की राजगद्दी पर बलबन का आधिपत्य हुआ |



पिता और पुत्र

सुलतान बलबन ने भारी संघर्ष और रक्तपात के बाद सत्ता संभाली थी , अपने राज्य को स्थिरता प्रदान करने के लिए उस ने जहा अनेक सुधार किये वह अपने दरबार की ओर भी ध्यान दिया |
बलबन जानता था कि दरबार का प्रभाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्य के मन पर अवश्य पड़ता है , इसीलिए उसने सबसे पहले अपने दरबार की शानशौकत , साज सज्जा और वैभव में वृद्धि की और इसके बाद दरबार के कई तौर तरीके निश्चित किये जिन का पालन सभी के लिए अनिवार्य था |
बलबन अनुशासन का इतना पक्का था कि कोई भी अमीर उसके दरबार में हँसने , जोर से बोलने या बैठने की हिम्मत नही कर सकता था , देखने वालो पर उसके आलीशान दरबार का रौब पड़े बिना नही रहता था | उस समय के यात्रियों और इतिहासकारों ने बलवान के दरबार की बहुत प्रशंसा की है |
सुलतान गियासुद्दीन बलबन ने अपने अस्सी वर्ष के लम्बे जीवन में न जाने कितने संघर्ष और उतार -- चढाव देखे थे , वह एक साधारण गुलाम से अमीर , अमीर से मलिक , मलिक से खान और खान से सुलतान बना था | उसका सारा जीवन संघर्षो से जूझते हुए बीता था |
इन्ही संघर्षो ने उसे लौह पुरुष बना दिया था , उसके सुदृढ़ शासन में आम जनता बहुत सुखी और सम्पन्न थी , अब सुलतान बलबन अस्सी वर्ष से उपर का हो गया था और प्राय: अस्वस्थ रहने लगा था , इसी बीच उस पर ऐसा वज्रपात हुआ जिस से बलबन जैसा लौह पुरुष भी टूट गया | |
तेरहवी शताब्दी के उत्तरार्ध में चंगेज खान के रूप में भयानक खूनी मंगोल योद्धा मध्य एशिया से निकल कर चारो ओर मारकाट मचाने लगा | इस ने कुछ ही समय में चीन , रूस , इरान , तुर्की तथा पश्चिम एशिया के देशो को रौद डाला | चंगेज खान भ्रष्ट बौद्ध था | उसने तथा उसके पुत्र हलाकू ने एशिया और यूरोप में लाशो के अम्बार लगा दिए थे , सौभाग्य से यह भयंकर दैत्य भारत में घुस कर पश्चिम की ओर मुड गया , लेकिन उसका एक सेनापति समर खान भारतीय सीमा क्षेत्र में भी आ धमका , जिससे इस देश में बहुत आतंक फ़ैल गया |
सन 1285 ई . में चंगेज खान की मंगोल सेना ने हिन्दुस्तान पर हमला कर दिया |

प्रसिद्ध इतिहासकार बरनी के शब्दों में '' हमलावर समर खान चंगेज खान के कुत्तो में सबसे बहादुर कुत्ता था " |
सुलतान बलबन के बड़े पुत्र युवराज खानेमुल्तान ने इन खुनी हमलावरों का मुकाबला किया | वह बड़ा ही योग्य , नीति कुशल और शूरवीर था | सुलतान ने इसे ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था , मुलतान , लाहौर और दीपालुपुर के सूबे उसके अधीन थे | शहजादा खाने मुलतान ने बड़ी बहादुरी से हमलावर मंगोलों का सामना किया और लड़ते -- लड़ते युद्ध भूमि में ही शहीद हो गया , इस युद्ध में उसके बहुत से अमीर भी मारे गये | बहुत से लोग कैदी बना लिए गये , प्रसिद्ध कवि अमीर खुसरो इसी लड़ाई में कैद किया गया था |
अस्सी वर्ष के वृद्ध सुलतान बलबन के लिए यह आघात असह्य सिद्ध हुआ | बीमार तो वह पहले से चला आ रहा था , युवराज की मृत्यु से तो वह बिलकुल ही टूट गया , यो राजकाज चलाने के लिए वह अब भी दरबार में आता था और दुःख को सीने में दबा कर सारे काम निपटाता था | पर रात को यह बुढा सुलतान बच्चो की तरह फूट फूट कर रोता , पागलो की तरह अपने सिर और दाढ़ी के बालो को नोचता और कपडे फाड़ डालता | उसकी दशा दिन -- प्रतिदिन बिगडती ही जा रही थी | उसने शहीद शहजादे के नाबालिग पुत्र कैखुसरु को अपने पिता के सुबो की जागीर दे दी | उसे अपना भविष्य अंधकारमय ही दिखाई पड़ता था |
सुलतान बलवान का दूसरा पुत्र बुगराखान लखनौती ( बंगाल ) की सुबेदारी पर नियुक्त था , सुलतान ने उसे दिल्ली बुला लिया और बड़े दर्द के साथ कहा '' बेटा मेरी मौत तो उसी दिन हो गयी थी जिस दिन तुम्हारा बड़ा भाई शहजादा खाने मुलतान चंगेज खान के कुत्तो द्वारा शहीद हो गया | अब तो मैं किसी तरह अपने बूढ़े शरीर को ढोता हुआ दिन पूरे कर रहा हूँ , मेरे बेटे , राज्य करना बच्चो का खेल नही है | मैं बहुत बुढा और बीमार आदमी हूँ , दो चार दिन का मेहमान हूँ , मेरे दोनों पुत्र कैखुसरु और कैकुबाद नाबालिग होने से राज्य संभालने योग्य नही है , तुम हर तरह से सुयोग्य हो , जवान हो इसीलिए अब तुम लखनौती का मोह छोड़ कर मेरे पास दिल्ली में ही रहो और साम्राज्य की बागडोर संभालो जिससे मैं शान्ति पूर्वक मर सकू '' |
बुगरा खान , भीरु , आलसी और मनमौजी प्रकृति का व्यक्ति था , राजनीति के झंझटो में पढ़ना , समस्याओं का दृढ़ता से सामना करना , उसके वश की बात नही थी | वह लखनौती के छोटे से सूबे को पाकर बहुत संतुष्ट और प्रसन्न था | जब एक सूबे की जागीरदारी से ही खूब आराम , भोगविलास , सुख और चैन प्राप्त हो सकता है तो फिर दिल्ली की राजगद्दी पर बैठकर काटो का ताज क्यों पहने ? अपने आनद से भरपूर जीवन में चिंता का विष क्यों घोले ?
वह जातना था कि दिल्ली की राजगद्दी पर बैठकर सुख चैन से जीवन बिताना असम्भव है | अत: उसने उपरी मन से अपने पिता से ' हाँ ' , कह दिया और तीन महीने तक दिल्ली में रहकर साम्राज्य का शासन प्रबंध व राजकाज देखता रहा | दिल्ली में रहकर इस विशाल साम्राज्य के संचालन से वह थक जाता और शीघ्र उकता जाता था , उसका मन जैसे तैसे इस जंजाल से निकल भागने को करता , लेकिन सुलतान की बीमारी से वह मजबूर था |

अपने पुत्र बुगराखान को दरबार में राजकाज करते देख कर बलबन को बड़ा संतोष हुआ , उस के दिल और दिमाग से चिंता का बोझ हट गया और धीरे -- धीरे उसके स्वास्थ्य में सुधार होने लगा |
बुगराखान का मन तो दिल्ली से निकल भागने के लिए छटपटा रहा था , अब बूढ़े सुलतान को स्वस्थ्य होते देख कर वह और अधिक न रुका तथा लखनौती के लिए रवाना हो गया , उसने अपने वृद्ध और रोगी पिता से आज्ञा लेने की आवश्यकता भी न समझी |
सुलतान और उस के नेतृत्व को यो मझधार में छोड़ कर बुगराखान के भागने से बलबन को बहुत धक्का लगा , उसकी हालत फिर बिगड़ गयी | उसके साथ शहीद शहजादे का पुत्र कैखुसरु तथा बुगराखान का पुत्र कौकुबाद था |
वृद्ध और मरणासन्न सुलतान बलबन अपने इन दोनों पुत्रो का मुंह देख देख कर अपने दुखी मन को बहलाया करता था | पर उसके विशाल हिन्द साम्राज्य का भार ये कोमल सुकुमार कैसे उठा सकते थे ? बाहर से साम्राज्य को चंगेज खान के खूनी भेडियो जैसे मंगोलों का बड़ा भय था जिन्होंने एशिया के देशो को रौदकर श्मशान बना दिया था | साम्राज्य के भीतर सत्ता के भूखे , लालची और कृतघ्न अमीरों की भी कमी न थी , '' कही ये कृतघ्न अमीर उसके नाबालिग बच्चो को ही कत्ल न कर डाले ? सोचते -- छोटे बलबन का मन हाहाकार कर उठता |
अपनी मृत्यु को बहुत निकट जानकार बलबन ने अपने अत्यंत विश्वास पात्र साथी महल में बुलवाए , इन में दिल्ली का कोतवाल वजीर हुसैन बसरी तथा दूसरे कई अमीर थे |
मरणासन्न सुलतान ने कापती आवाज में उनसे कहा , '' आप सब लोग मेरे अत्यंत विश्वास पात्र है , आप शासन व्यवस्था और प्रशासन के काम काजो को चलाने का दंग जानते है , मेरी मृत्यु बहुत निकट आ गयी है , मेरी इच्छा है कि मेरी मृत्यु के बाद शहजादे खाने मुलतान के पुत्र कैखुसरु को राजगद्दी पर बैठाए | अभी वह बालक है , लेकिन मैं क्या करू ? मेरा पुत्र बुगराखान को राजगद्दी से जी चुराकर अपनी मर्जी से निकल भागा है | अब मुझे आप लोगो का ही भरोसा है , आप लोग मेरे पुत्र की रक्षा करे और उसे अपना सुलतान माने '' |
सभी उपस्थित अमीरों ने सुलतान को अपनी वफादारी और स्वामिभक्ति का पूरा पूरा विश्वास दिलाया | इसके तीन दिन बाद सुलतान बलबन की मृत्यु हो गयी | कुशके लाल ( लाल महल ) से रात के समय उसका शव निकाला गया और उसे बाहर ले जाकर दफना दिया गया | सुलतान की अंतिम इच्छा के विरुद्ध खाने मुलतान के पुत्र कैखुसरु को राजगद्दी से वंचित करके उसे मुलतान भेज दिया , कयोकि ये लोग किसी विशेष कारण से शहीद शहजादे खाने मुलतान से नाराज थे , इन विश्वासघाती अमीरों ने बुगराखान के पुत्र कैकुबाद को सुलतान मुइजुद्दीन की पदवी से विभूषित करके दिल्ली के गद्दी पर बैठा दिया | कैकुबाद को सन 1286 में राजगद्दी मिली , सुलतान बनते समय उसकी अवस्था 18 वर्ष थी |
नवयुवक सुलतान कैकुबाद में कई गुण थे , वह बड़ा सुन्दर शांत स्वभाव वाला और दयालु प्रकृति का नवयुवक था , लेकिन उसके सारे गुणों को एक दुर्गुण ने दबा कर नष्ट कर दिया , वह दुर्गुण था भोगविलास में आसक्ति , बचपन से लेकर अब तक वह अपने प्रतापी दादा बलबन के कठोर अनुशासन में रहा था |
सुलतान बलबन के डर से उस के अध्यापक कैकुबाद पर कड़ी दृष्टि रखते थे | रात -- दिन लगातार उसकी गतिविधियों पर अध्यापको की सतर्क दृष्टि रहती थी , अध्यापको ने उसे विनम्र भाषण , पुरुषोचित व्यायाम था दूसरी विद्याये सिखाई थी , शहजादे पर सुरा और सुंदरी की परछाई तक नहो पड़ने दी जाती थी |
जब नवयुवक कैकुबाद ऐसे कठोर अनुशासन से निकल कर एकाएक समर्थ स्वतंत्र व शक्तिशाली सुलतान बन गया तो उस की अतृप्त वासनाए सयम का बाँध तोड़कर फूट पड़ी , उसने अब तक सीखे हुए सारे गुण , व्यायाम , कला , विद्या , हुनर , सयम सभी को एक ओर उठाकर रख दिया और रात दिन शराब पी कर सुन्दरियों की संगती में लीं रहने लगा |
अब उसे युवतियों के गोर चाँद से मुख ही प्यारे लगते और दाढ़ी मुछो वाले पुरुषो की सूरत तक से नफरत होती | वह महीनों ऐशगाह से बाहर न निकलता , शेष खान अमीर मलिक तथा दुसरे राज्य अधिकारियों ने भी सुल्तान की नकल की और रागरंग में डूब गये , बलबन का सुदृढ़ और सुसंगठित शासनतंत्र ढीला होकर चरमराने लगा |

इस मनमौजी सुलतान का मन दिल्ली से ऊब गया , यहाँ भीड़ -- भाड़ , छोटे -- बड़े मकानों और टेडी - मेढ़ी गलियों के भूलभुलैया को देखकर उस का मन कुढ़ जाता | उस की समझ में यह बात बैठती ही नही थी कि जितने लोग है , ये भी क्यों नही कच्चे मकानों की जगह महलो में रहना शुरू कर देते | ये दिल्ली वासी सुलतान और उसके अमीरों की तरह क्यों नही अच्छा पहनते और खाते ? सुलतान का दिल करता कि इन '' असभ्य '' लोगो के झोपड़ो में आग लगा दे , उसे इन '' जाहिलो और जंगली '' लोगो के बीच रहना भी मंजूर न था |
इसीलिए उसने दिल्ली छोड़कर अन्यत्र अपनी राजधानी बसाने का निश्चय किया इसके लिए पास ही किलोखड़ी में यमुना किनारे सुन्दर रमणीक स्थान चुना गया | जहा बादशाह के लिए आलीशान महल , ऐशगाह और बाग़ -- बगीचे हो | जहा उसके अमीरों के लिए भी आसमान को छूने वाली हवेलियों की कतारे हो , महलो और हवेलियों के सिवा और कुछ भी न हो |
सुलतान यह भूल गया कि उस के साम्राज्य में 95% व्यक्ति ऐसे ही है जो उसकी नई दिल्ली ( किलोखड़ी ) में रहने योग्य नही है | उसकी नई राजधानी को महल , हवेली , बाग़ - बगीचों से सजाने वाले यही वे '' जाहिल '' थे | जिन्हें इस सुन्दर नगरी में रहने की आज्ञा न थी | यदि वे न होते तो कौन अपना खून पसीना बहाकर इस आलीशान नगरी को बनाता ? यदि वे न होते तो कौन अपना पसीना बहाकर उसके लिए साम्राज्य स्थापित करता ? लेकिन उस घोर सामन्तवादी युग में ऐसी बाते सोचने की बुद्धि ही किस में थी ?
नवयुवक सुलतान ने दिल्ली के लाल महल को छोड़कर किलोखड़ी शहर के बीच यमुना तट पर ( जो अब दिल्ली का एक छोटा सा गाँव है ) अपने लिए सुन्दर -- सुन्दर रंगमहल और ऐशगाह बनवाये जिन में विषय , भोग , ऐश आराम और सुख के हजारो साधन मौजूद थे | यही यमुना किनारे उसने एक सुन्दर बाग़ लगवाया | सुलतान की देखादेखी उसके दूसरे अमीरों ने भी यहाँ अपने अपने महल बनवाये , धीरे -- धीरे दिल्ली की रौनक खीच कर किलोखड़ी में पहुच गयी | यहाँ आकर सचमुच सुलतान के साम्राज्य की कील उखड़ गयी | जिससे सारी की सारी दिल्ली सल्तनत डगमगा उठी और इससे पैदा होने वाले तूफ़ान में स्वंय सुलतान कैकुबाद सूखे पत्ते की तरह उड़ गया , कौन था उसके तख्त की कीले उखाड़ने वाला ?

वह व्यक्ति था --- मलिक निजामुद्दीन ? यह दिल्ली के कोतवाल मलिक कुल उमरा का भतीजा था , सुलतान ने इस धूर्त व्यक्ति के स्वभाव को परखे बिना ही उसे राज्य का सर्वेसर्वा बना दिया | पहले इसे दादबक ( महान्यायवादी ) और बाद में नायब ए मुल्क ( साम्राज्य का उपप्रधान ) बना दिया , साम्राज्य उसी के हाथो में थी |
सुलतान को तो सुरा और सुंदरी के उपभोग से ही समय नही मिलता था , विषय भोगो के अत्यंत सेवन से उसका योवन पुष्प खिलने से पहले ही कुम्हला गया | दिन पर दिन उसका स्वास्थ्य गिरने लगा | शरीर दुर्बल होकर पिला पद गया | लेकिन इसकी विषय लिप्सा में किसी प्रकार की कमी नही होने पाई |
मलिक निजामुद्दीन उन व्यक्तियों में से था , जिनके विषय में कहा जा सकता है कि वे जिस थाली में खाते है , उसी में छेद करते है | राज्य की बागडोर अपने हाथो में आते ही उसने अपने विरोधियो को रास्ते से हटाना शरू कर दिया , उसने सोचा , '' बूढ़े सुलतान बलबन ने 60 वर्षो तक दिल्ली साम्राज्य की देखभाल करके इसकी जड़े बहुत गहरी जमा दी थी | लोग उसके फौलादी शासन में विद्रोह न कर सके | उसके मरने से साम्राज्य में शक्ति शुन्यता आ गयी है | युवराज खाने सुलतान मर चुका है | बुगराखान लखनौती को लेकर ही मगन है | सुलतान कैकुबाद विश्यास्क्त्त होकर दीन दुनिया से बेखबर है | ऐसी दशा में मैं यदि शहजादे खानेमुलतान
के पुत्र कैखुसरु को मार डालू तो यह राज्य मेरी गोदी में पके हुए आम की तरह आ टपकेगा |

मन में इस प्रकार की दुर्भावना जमा कर इस विश्वासघाती कृतघ्न मलिक ने समय पाकर अनाडी सुलतान कैकुबाद से कहा , '' आपके दादा बलबन ने मरते वक्त कैखुसरु को सुलतान नियुक्त किया था लेकिन हमने चतुराई से आप को ही सुलतान बनाना उचित समझा | कैखुसरु आपके हिन्द साम्राज्य का हिस्सेदार है , वह कितने ही मलिक और अमीरों से मिलकर आपको मारने का षड्यंत्र रच रहा है जिससे आपका पूरा साम्राज्य ही उसका हो सके | विषयों में अंधे बने सुलतान ने सच्चाई जाने बिना ही कैखुसरु की हत्या करने के फरमान पर अपने हस्ताक्षर कर दिए | इसके बाद मलिक निजामुद्दीन ने कैखुसरु को दिल्ली आने का फरमान भेजा जब अभागा शहजादा मुलतानस से रोहतक पहुंचा तो मलिक के भेजे हुए हत्यारों ने उसे कत्ल कर दिया |
इस हत्या से दिल्ली ही नही सारे साम्राज्य में हलचल मच गयी | मलिक निजामुद्दीन का हौसला और बढ़ा , वह किसी बात पर सुलतान के एक वजीर ख्वाजा खतीर से नाराज हो गया | इस पर उसने वजीर को गधे पर चढा कर सारी दिल्ली और किलोखड़ी के बाजारों में घुमाया |
वजीर के इस घोर अपमान से राजधानी में आतंक छा गया | अब उसकी दृष्टि नये मुसलमानों पर पड़ी , वस्तुत: ये मंगोल थे जो बलबन के समय इस्लाम धर्म स्वीकार कर यही राजधानी में बस गये थे | इन नये मुसलमानों में बहुत एकता थी | और इनका एक बहुत शक्तिशाली गुट था | मलिक ने इन्हें अपनी योजना की पूर्ति में बाधक जानकार उखाड़ फेकने का निश्चय किया |
एक दिन नशे में मदहोश सुलतान से इनकी चुगली करते हुए कहा कि ये सुलतान के खिलाफ साजिश कर रहे है , इसी नशे की हालत में उसने इनकी हत्या करने के फरमान पर दस्तखत करा लिया और अचानक ही एक बहुत बड़ी सेना के सहायता से इन नये मुसलमानों की बस्ती को घेर लिया और सब को स्त्री बच्चो समेत कैद कर लिया | इन सभी कैदियों को पकड़कर निर्दयी मलिक यमुना किनारे ले गया और वह इन सब को क़त्ल कर डाला , यहाँ तक कि स्त्रियों और बच्चो को भी मार डाला हजारो मुसलमानों और उनके स्त्री बच्चो की इस सामूहिक हत्या से सारी दिल्ली में आतंक फ़ैल गया |
इस जघन्य हत्याकांड के बाद मलिक ने इन अभागो की सुनी बस्ती को लुट लिया और उसमे आग लगा दी | इसके नबाद उसने मुलतानके अमीर शेख और बरन के जागीरदार मलिक तुजकी
को मरवा डाला | ये दोनों ही बलबन के बड़े प्रसिद्ध और शक्तिशाली मलिक थे |

सुलतान कैकुबाद राजनीति और प्रशासन की कला में बिलकुल कोरा था , विषय लिप्सा ने उस के शरीर और मन बहुत दुर्बल बना दिया | मलिक निजुआमुद्दीन का उस के उपर बहुत प्रभाव था |यदि उसका कोई स्वामिभक्त अमीर मलिक निजामुद्दीन के अत्याचार और आतंक के विषय में सुलतान से कुछ कहता तो वह मूर्खतावश सारी बाते मलिक से कह देता कि अमुक आदमी तुम्हारे विषय में यह कह रहा था अथवा कभी -- कभी तो वह इन शुभचिंतक सेवको को सीधा यह कहकर मलिक के हवाले कर देता , '' ये लोग हमारे -- तुम्हारे बेच फूट डालना चाहते है ; '' |
मलिक निजामुद्दीन इन लोगो को तडपा - तडपा कर मार देता , नतीजा यह हुआ कि सुलतान से सच्ची बात कहने का किसी में साहस न रहा | मलिक का हौसला और बढ़ गया |
मलिक निजामुद्दीन का सुलतान के साम्राज्य व शासन प्रबंध में ही नही अपितु ख़ास रंगमहलो तक में भारी दबदबा था | मलिक की बेगम नवयुवक सुलतान की '' धर्ममाता '' बनी हुई थी ||
सुलतान के हरम का संचालन इसी कर्कशा और खूसट औरत के हाथ में था |
कामुक सुलतान इस कुटिल दम्पत्ति के हाथो की कठपुतली बन गया | मलिक के इस प्रभाव को देखकर बहुत से अमीर अपने प्राण बचाने अथवा अधिक लाभ पाने की आशा में उसके झंडे के नीचे आ गये | इस तरह उसकी शक्ति और भी बढ़ गयी | शक्ति बढ़ने के साथ उसका दिमाग भी सातवे आसमान पर रहने लगा |
एक दिन मलिक के चाचा एवं ससुर मलिक कुल उमरा फकरुद्दीन ने , जो दिल्ली के कोतवाल थे | उसे एकांत में समझाया , '' बेटा , मैंने और तेरे पिता ने अस्सी वर्ष तक दिल्ली की कोतवाली की है | हम लोग कभी राजनितिक हथकंडो में नही पड़े | इसीलिए अब तक सुरक्षित रहे | तुम भी इन राजनितिक कुचक्रो षडयंत्रो , हत्याओं , लूटमार और उखाड़ पछाड़ से दूर रहो , इसी में तुम्हारा कल्याण है | यदि तुमने राजगद्दी के लोभ से विषयान्ध दुर्बल सुल्तान को मार भी दिया तो उसके अमीर तो तुम्हारी जान के ग्राहक हो ही जायेंगे | मरने के बाद भी इस पाप का जबाब खुदा को देना होगा |
बूढ़े और अनुभवी कोतवाल की इस शिक्षा का मलिक पर कोई असर नही हुआ | वह उसी खोटी चल पर चलता रहा |
मलिक निजामुद्दीन के आतंक , अत्याचार , और सुलतान के विषय भोगो में लिपटे रहने की कहानिया सारे देश में फ़ैल चुकी थी | सुलतान कैकुबाद का पिता बुगराखान लखनौती का सूबेदार था | बलबन की मृत्यु के बाद उसने स्वंय को स्वतंत्र सुलतान घोषित कर के फतवा पढवाया था | जब से उसके कानो में दिल्ली की ये घटनाए पहुची तो वह अपने पुत्र की प्राण रक्षा के लिए चिंतित हो उठा | पिता और पुत्र के बीच संदेशो और भेटो का आदान प्रदान चलता रहता था | उसने बार बार अपने बेटे को शिक्षाए लिख कर भेजी कि वह विषय भोगो में न फंस कर अपने राज्य की देखभाल में मन लगाये , लेकिन सुल्तान पर इन उपदेशो का असर नही हुआ |
पत्रों से कोई प्रभाव न पड़ता देखकर बुगराखान ने अब स्वंय अपने पुत्र से मिलने का विचार किया और इस आशय का एक पत्र दिल्ली भेजा | जिसे पढ़कर सुलतान का सोया हुआ पितृ प्रेम
जाग उठा | और वह अपने पिता से मिलने को उत्सुक हो उठा | दिल्ली और लखनौती के बीच कई सन्देश और पत्रों का आदान प्रदान होने के बाद यह तय हुआ कि पिता और पुत्र अवध में सरयू नदी के तट पर मिलेंगे |
सुलतान ने प्रसन्न मन से अवध यात्रा की तैयारी करने का आदेश दिया | सुलतान के उत्साह और धूमधाम से यात्रा की तैयारी ने मलिक निजामुद्दीन के कण खड़े कर दिए | उसने सोचा , '' कही ऐसा न हो कि बुगराखान अपने पुत्र को उसके विरुद्ध भडका दे , '' उसने पहले तो सुलतान को जाने से रोकना चाहा पर जब सुलतान के हठ के आगे उसकी एक न चली तो उसे सेना साथ ले जाने की सलाह दी | कैकुबाद ने यह सलाह मान ली | दिल्ली का सुल्तान अपने पिता से मिलने के लिए जल्दी से जल्दी पड़ाव पर पड़ाव डालता हुआ सरयू नदी के किनारे जा पहुचा |

बुगराखान कोजब अपने पुत्र सुलतान के सेना सहित आगमन का पता चला तो वह समझ गया कि दुष्ट मलिक ने उसके बेटे को उलटी -- पट्टी पढाई है | फिर भी मिलने की तैयारिया की | उसने जंगी हाथी , सवार तथा फौजे सजा कर धूमधाम से सरयू के पूर्वी तट पर डेरा डाल दिया | पिता और पुत्र की छावनिया सरयू नदी के किनारे आमने -- सामने पड़ गयी | दो तीन दिन तक संदेशो का आदान -- प्रदान चलता रहा | अन्त में निश्चय हुआ कि बुगराखान नदी पार करके अपने पुत्र के दरबार में कदमबोसी के लिए आयेगा |
जब दिल्ली के अमीरों का यह सन्देश बुगराखान को मिला तो उसने कहा , '' भले ही कैकुबाद मेरा बेटा है , फिर भी वह दिल्ली का सुलतान है | मैं पिता होते हुए भी उसका छोटा सा सूबेदार हूँ | मैं दिल्ली सुलतान के कदम चूमने दरबार में अवश्य जाउंगा इसी में दिल्ली के सुलतान और सल्तनत की इज्जत है | मैं इस इज्जत को कायम रखूंगा | दूसरे दिन सुलतान कैकुबाद की छावनी में दरबार सजाया गया , पिता और पुत्र के ऐतिहासिक मिलन की इस घटना को अमर बनाने के लिए दरबार की शानशौकत और साज सजावट खूब तडक भड़क के साथ हुई | दिल्ली का नवयुवक सुलतान कैकुबाद अपने खान मलिक , अमीर और दूसरे अधिकारियों सहित शाही गौरव के साथ दरबार में राजगद्दी पर बैठा था | थोड़ी देर बाद उसका पिता बुगराखान अपने चुने हुए अमीरों के साथ सुलतान के आगे कदमो में अपना सिर झुकाने आया | उसने दरबार में घुसते ही ऊँचे मंच के उपर रत्नजटित राज सिहासन पर अपने भाग्यशाली पुत्र को बैठे देखा तो उस का हृदय आनंद से खिल गया | उसने पिता पुत्र के सम्बन्ध को भुलाकर दिल्ली सुलतान के सामने धरती पर तीन बार अपना माथा रगडा और फिर सिहासन की ओर बढ़ा | सुलतान कैकुबाद पत्थर के एक बुत की तरह अपलक नेत्रों से इस सारे कार्यक्रम को देख रहा था | उसका वृद्ध पिता उसके सामने धरती पर माथा रगड़ रहा था | वह अब और अधिक न सारे चिन्ह एक ओर हटा दिए और सिहासन से उठ खड़ा हुआ , वह एक क्षण के लिए झिझका और फिर '' अब्बाजान '' कहता हुआ दौड़ कर उसकी छाती से जा लगा |
पिता और पुत्र दोनों के इस मिलन को देखकर उस समय बड़े -- बड़े पत्थर दिल वाले सभी अमीर तुर्क रो पड़े | सारे दरबार में भावुकता का दौर बह चला | जिसे देखो वही आँसू भा रहा था |
कुछ समय बाद पिता और पुत्र ने धैर्य धारण किया | सुलतान कैकुबाद सादर अपने पिता को राज सिहासन तक ले गया और उसे अपने बराबर बैठाया | दोनों ओर से भेटो का आदान -- प्रदान हुआ | औपचारिक राजनितिक वार्तालाप हुआ और फिर एकांत में दोनों कुछ समय बाते करते रहे | वातावरण बड़ा ही सुखद आह्लादकारी था | राज्य को लेकर पिता और पुत्र में प्रेम तथा सौहार्द उत्पन्न होना -- यह सरयू तट की शाश्वत विशेषता है |
इसी प्रकार कई दिनों तक पिता और पुत्र की भेटे होती रही , एक दिन बुगराखान ने सुलतान को जमशेद के कहानी सुनाई '' मेरे लाडले बेटे ' इस प्रकार विषय भोगो में डूब कर तुम अपना स्वास्थ्य और साम्राज्य तो नष्ट कर ही लोगे , उन महान सम्राटो के उपदेशो का भी अनादर कर डोज ' |
भावना में बहकर वह रो पडा , ममता ने उसके हृदय पर अधिकार जमा लिया \ सुलतान ने पिता के चरणों में सिर रखकर कहा '' अब्बा हुजुर , इस बार आप माफ़ कर दे , दोबारा आपको कोई शिकायत सुनने को नही मिलेगी , मैं इन बुरे कामो से तौबा करता हूँ |
सुलतान ने कहा , '' बेटा तुम तब तक सफल नही हो सकते जब तक दुष्ट निजामुद्दीन का तुम पर प्रभाव है '' |
'' मैं मलिक को भी चतुराई से ठिकाने लगा दूंगा , '' सुलतान ने आश्वासन दिया |
बुगराखान ने आह भरकर कहा , '' बेटा बहुत सोच समझकर फूंक -- फूंक कर कदम रखना , तुम ने न जाने कितने आस्तीन के साँप पाल रखे है |
यह उन दोनों की अंतिम भेट थी | दोनों ने आँसू भरी आँखों से एक दूसरे को विदा किया | पिता से मिलने के बाद विषय लोलुप्त सुलतान कैकुबाद के जीवन में एकदम परिवर्तन आ गया | उसने शारब से पूरी तरह तौबा कर ली | सुन्दरियों के जमघट को दूर हटा दिया अब वह एक कर्मठ युवक की तरह राजकाज देखने लगा था | सुलतान के इस परिवर्तन से मलिक निजामुद्दीन का माथा ठनका , उसे अपने हाथ से साम्राज्य की बागडोर खिसकती दिखाई दी | उसने सुलतान के मन और सयम को विचलित करने के लिए षड्यंत्र रचा | वह किसी अद्दितीय अल्हड युवती की तलाश में व्यस्त हुआ जिसमे सहज आकर्षण हो | उसकी खोज सफल हुई और उसने एक बेश्या की अति सुन्दर , चतुर , वाचाल अल्हड बछेडी की तरह मदमस्त एक नवयुवती लड़की को ले लिया और पड़ाव के आगे बीच रास्ते में खेतो की मेड़ो पर एक ऐसी जगह बैठा दिया , जहा सुलतान की नजर उस पर पड़ कर ही रहे , साथ ही ऐसा हो कि वह उस स्थान पर सुलतान को अकस्मात मिलती सी जान पड़े |

अगले दिन सुलतान की सवारी उस रास्ते से निकली तो उसने खेत की मेड पर एक सुन्दर ग्राम्य गीत गाती हुई उस आकर्षक कन्या को देखा जिसके रोम -- रोम से सौन्दर्य और लावण्य का स्रोत फूट रहा था | सुलतान इस अल्हड युवती के मधुर आवाज , रूप माधुरी अदा , शोखी हाजिर जबाबी और कविता पर सौ जान से कुर्बान हो गया | वह सुंदरी कविता में ही बाते करती थी | उसकी वेश भूषा बड़ी भव्य और आकर्षक थी | उसके हाव - भाव किसी भी जितेन्द्रिय का धैर्य और सयम डिगाने के लिए पर्याप्त थे |
सुलतान का मन उस सुन्दरी बाला के रूप जाल और हाव - भाव पर बुरी तरह रीझ गया | वह एक बार गिरा तो बस गिरता ही चला गया | उस अल्हड , मस्तानी लड़की के एक कटाक्ष पर ही वह अपने पिटा की सारी शिक्षा भूल गया | शराब और सुंदरी से बचने की सारे प्रतिज्ञाए पानी में बह गयी | उसकी जिन्दगी फिर उसी पुराने ढर्रे पर चलने लगी | मलिक अपनी सफलता पर फुला न समाया | लेकिन अब उसके पापो का घडा भर चुका था | एक दिन अचानक सुलतान की मोह निद्रा टूटी | उसे अपने पिता के वाक्य याद आये , उसने बड़ी कुशलता से इस दुष्ट मलिक को विष देकर मरवा दिया | इस तरह उसने इस महत्वाकांक्षी निर्कुश व्यक्ति से अपनी प्राण रक्षा कर ली |
मलिक निजामुद्दीन में यदि राजद्रोह व अमीरों के प्रति द्वेषभाव न होता तो वह सोने का आदमी था , वह कुशल प्रशासक , परिश्रमी , धुन का पक्का था | उसके मरते ही सारा प्रशासनिक ढाचा चरमरा कर गिर पडा | अति विषय सेवन से दुर्बल होकर सुलतान को अर्धांग ने धृ पकड़ा | अब वह खात पर पडा पडा कराहने के अलावा और कुछ नही कर सकता था | दिन प्रतिदिन उसकी दशा बिगडती जा रही थी | इधर राज्य में बड़ी अराजकता फैलने लगी | इस भयंकर स्थिति को देखते हुए बलबनी अमीरों ने कैकुबाद के नन्हे से पुत्र को शम्सुद्दीन का खिताब देकर दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया | देश में अशांति और अराजकता के बादल गहरे होते जा रहे थे |
इस अराजकता का लाभ जलालुद्दीन खिलजी ने उठाया | वह समाना का नायब और बरन का जागीरदार था | उसने अपने सरदारों को एकत्रित करके विद्रोह का झंडा खड़ा कर दिया | जलालुद्दीन खिलजी के साहसी पुत्रो ने पांच सौ सवार लेकर एक दिन अचानक महल पर हल्ला बोल दिया और नन्हे सुलतान को उठा ले गये | इसी बीच खिलजियो ने एक मलिक को सुन्ल्तान कैकुबाद की हत्या करने भेजा सुलतान ने पहले कभी इस मलिक के पिता को मरवा डाला था | यह मलिक एक शक्तिशाली सैनिक दस्ते के साथ महल में घुस गया |
सुलतान अर्धांग रोग से अपंग और लाचार होकर पलंग पर पडा था वह फटी फटी आँखों से इन हत्यारों को देखता रहा | मलिक ने सुलतान को तीन -- चार ठोकरे मारी , फिर उसे उठाकर यमुना में फेंक दिया | ठोकरों और बीमारी से अधमरे सुलतान की दुर्बल काया को यमुना की लहरों ने अपनी बाहों में समेत लिया |
सुलतान कैकुबाद के इस करूं अंत के साथ दिल्ली पर तुर्कों का शासन समाप्त हो गया और खिलजियो की पताका फहराने लगी |

-सुनील दत्ता
 स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक 
आभार -- स . विश्वनाथ

शुक्रवार, 14 जून 2013

फर्जी मामले और राज्यतंत्र कहां है न्याय

आतंकवाद से संबंधित मुकदमों में झूठे फंसाए गए युवकों को न्याय दिलवाने के गठित संगठन  रिहाई मंच के कार्यकर्ता इन दिनों ;जून 2013 मौलाना खालिद मुजाहिद की मौत के लिए जिम्मेदार पुलिस और आई.बी. कर्मियों के निलंबन,आर. डी. निमेश आयोग की रपट को लागू किए जाने और आतंकी हमलों के सिलसिले में गिरफ्तार निर्दोष मुस्लिम युवकों को रिहा करने की मांग को लेकर धरना.प्रदर्शन कर रहे हैं। इस अभियान को मुस्लिम समुदाय के साथ.साथ, मानवाधिकार संगठनों का भी व्यापक समर्थन मिल रहा है। यह एक सामाजिक समूह की, असंवेदनशील और पूर्वाग्रहग्रस्त राज्यतंत्र को सही राह दिखाने की कोशिश है। रिहाई मंच का उद्देश्य है कि सरकार पर समाज का दबाब बनाकर निर्दोष युवकों को न्याय दिलवाया जाए।
समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव सरकार का यह दावा रहा है कि वह मुसलमानों की जबरदस्त हितचिंतक है। यहां तक कि मुलायम सिंह यादव को मुल्ला मुलायम तक कहा जाता है। परन्तु समाजवादी पार्टी के उत्तरप्रदेश में सत्ता में आने के बाद सेए राज्य में सरकार की नाक के नीचे जमकर सांप्रदायिक हिंसा हुई है। अखिलेश यादव शासनकाल में अब तक 27 साम्प्रदायिक दंगे हो चुके हैं। चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी ने यह वायदा किया था कि सत्ता में आने पर वह आतंकी हमलों में जबरन फंसाये गये मुस्लिम युवकों को रिहा करेगी। यह तो हुआ नहीं उल्टे, मौलाना खालिद मुजाहिद की पुलिस हिरासत में मृत्यु हो गई। इस घटना ने यादव सरकार के असली इरादों के बारे में गंभीर संदेह उत्पन्न कर दिये हैं। आर.डी. निमेश आयोग की रपट को लंबे समय तक ठंडे बस्ते में डालकर रखा गया और अबए जबकि, वह सार्वजनिक कर दी गई हैए उसे लागू करने का सरकार का कोई इरादा नजर नहीं आता। सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि विधानसभा के अगले सत्र में रपट पर चर्चा की जायेगी। तथ्य यह है कि सरकार को रपट पर कार्यवाही के लिए विधानसभा की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है। यह काम मंत्रिमंडल के स्तर पर ही हो सकता है। आमजनों को डर है कि अन्य रपटों की तरह, यह रपट भी किसी सरकारी दफ्तर की पुरानी.सी अलमारी में धूल खाती रहेगी।
आशीष खैतान एक निहायत ईमानदारए प्रतिबद्ध और संवेदनशील पत्रकार हैं। उन्होंने एक वेबसाईट शुरू की हैए जिसका नाम है गुलेल। इस वेबसाईट पर उन्होंने निर्दोषों को फंसाने के प्रयासों से संबंधित रपटों को रखा है। अनेक पुलिस अधिकारियों ने अपनी कार्यक्षमता साबित करने के लिए निर्दोष युवकों को यह जानते हुए भी आतंकी हमलों के मामलों में अभियुक्त बना दिया कि उनकी उसमें कोई भूमिका नहीं है। कुछ ने यही काम उन पूर्वाग्रहों के चलते कियाए जो हमारी कानून और व्यवस्था की मशीनरी के एक बड़े हिस्से के दिलो.दिमाग पर छाए हुए हैं। इन पूर्वाग्रहों के चलतेए ये लोग ऐसा मानते हैं कि आतंकवाद से सिर्फ एक धर्म विशेष के युवक जुड़े हुए हैं। खैतान का मत है कि इस तरह के मामलों में अंततः सच के सामने आ जाने से भी कोई खास फर्क नहीं पड़ता क्योंकि तब तक संबन्धित व्यक्ति जेल में लंबा समय बिता चुका होता हैए पुलिसकर्मियों के हाथों घोर यंत्रणा भोग चुका होता है और अखबारों व इलेक्ट्रानिक मीडिया के जरिए अपने समुदाय, अपने मोहल्ले, अपने रिश्तेदारों और अपने शहर में बदनाम हो चुका होता है। खैतान को उम्मीद है हमारी न्यायपालिका से और नयाय के लिए संघर्षरत विभिन्न सामाजिक समूहों से। उत्तरप्रदेश में वर्तमान में चल रहा धरना, समाज का ध्यान इस समस्या की ओर आकर्षित कर रहा है और लगभग दो सप्ताह से सामाजिक कार्यकर्ता और पीड़ित परिवारों के सदस्यगण इस धरने में भागीदारी कर रहे हैं। झूठे फंसाए गए युवकों के परिजनों का कहना है कि इससे संबंधित युवकों का भविष्य बर्बाद हो रहा है और कई मामलों में उन्हें अपने ही समुदाय के सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। इस दिशा में पहले भी कई प्रयास हो चुके हैं। हर बार कुछ समय के लिए हालात में सुधार आता हैए जांच एजेंसिया कुछ बेहतर बर्ताव करती हैं परन्तु जल्दी ही चीजें अपने पुराने ढर्रे पर लौट आती हैं।
उत्तरप्रदेश ही नहीं, पूरे देश में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों की कथनी और करनी में अंतर देखा जा सकता है। महाराष्ट्र में कांग्रेस ने चुनाव प्रचार के दौरान यह वायदा किया था कि सत्ता में आने पर वह सन् 1992.93 के मुंबई दंगों के संबंध में श्रीकृष्ण जांच आयोग की रपट को लागू करेगी। परन्तु इस वायदे को आज तक पूरा नहीं किया गया है। एक के बाद एक नये.नये बहानों से कार्यवाही को टाला जा रहा है और दोषी पुलिस अधिकारी और राजनैतिक नेताए दंगों में उनकी भागीदारी के पुख्ता सबूत होने के बावजूदए अपने पदों पर बने हुए हैं। उनका बाल भी बांका नहीं हुआ है। समाजवादी पार्टी भी इस मामले में कोई अलग साबित नहीं हुई है। आरण्डीण् निमेश आयोग ने अपनी रपट में पर्याप्त तथ्य और सबूत दिए हैं और उनके आधार पर दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है। परन्तु ऐसा नहीं किया जा रहा है। चाहे वह कांग्रेस हो या समाजवादी पार्टीए सभी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों का अल्पसंख्यकों को न्याय दिलवाने के मामले में रवैया अत्यंत अवसरवादी है। जहां साम्प्रदायिक पार्टियां अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर डाका डालने को आतुर हैं और उनके साथ न्याय होए इसमें ऐसे दलों की कोई रूचि नहीं हैए वहीं धर्मनिरपेक्ष पार्टियों का दोहरा चरित्र है। वे वायदे तो ढेर सारे करती हैं परन्तु उन्हें पूरा नहीं करतीं क्योंकि उन्हें यह डर होता है कि इससे उनके वोट बैंक को क्षति पहुंचेगी।
इस स्थिति के लिए कई अलग.अलग कारण जिम्मेदार हैं। पहली बात तो यह है कि धर्मनिरपेक्षता के मूल्य ही इन पार्टियों के पथप्रदर्शक नहीं हैं। उनका नीतियां और निर्णय कई अन्य कारकों से भी निर्धारित होती है। अगर सरकारें प्रतिबद्धता और दृढ़संकल्प से काम करें तो साम्प्रदायिक दंगों को रोकना संभव है। परन्तु ऐसा जानते.बूझते नहीं किया जाता। दूसरी समस्या हैए राज्यतंत्र, जांच एंजेसियों, पुलिस और नौकरशाही का साम्प्रदायिकीकरण। किसी भी आपराधिक मामले में असली दोषियों को पकड़ना कठिन होता हैय किसी को भी पकड़कर उसे दोषी करार देना आसान। और यही रास्ता हमारे खाकी वर्दीधारी अपनाते हैं। यही कारण है कि विभिन्न दंगा जांच आयोगों की रपटों को किसी सरकार ने लागू नहीं किया। भिवंडी दंगों की जांच के लिए नियुक्त मादोन आयोग से लेकर श्रीकृष्ण आयोग और लिब्रहान आयोग तक, अवसरवादी राजनैतिक नेतृत्व ने सिद्धांतों के प्रति निष्ठा नहीं दर्शायी और इन रपटों को लागू करने की कोशिश तक नहीं की।
बहरहालए अब रास्ता क्या है। जहां साम्प्रदायिक ताकतें, धार्मिक अल्पसंख्यकों को आंतकित करने में जुटी हुई हैं वहीं धर्मनिरपेक्ष समूहों में इतनी हिम्मत नहीं है कि वे न्याय और बराबरी के लिए खुलकर लड़ सकें। इसलिए यह जरूरी है कि समाज इस दिशा में सक्रिय हो।  कई सामाजिक संगठनों ने इन मुद्दों को गंभीरता से लिया है और उनके द्वारा की गये पहल के अच्छे नतीजे भी सामने आए हैं। अचंभे की बात यह है कि वामपंथी पार्टियां, जिन्हें सैद्धांतिक रूप से धर्मनिरपेक्षता के प्रति सम्पूर्ण निष्ठा रखनी चाहिए, सामाजिक समूहों के प्रयासों से जुड़ नहीं रही हैं। अगर वे ऐसा करेंगी तो इससे कांग्रेस व समाजवादी पार्टी जैसे दलो पर इस बात के लिए दबाव बनेगा कि वे निष्ठापूर्वक अपने वायदों को निभायें और कर्तव्यों का निर्वहन करें।
न्यायपालिका और सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों के जरिए जबरन फंसाए गए अल्पसंख्यक युवकों को न्याय दिलवाने के प्रयासों को तेज किया जाना चाहिए। हमारे राज्यतंत्र और प्रजातांत्रिक ढांचे में साम्प्रदायिक तत्वों ने घुसपैठ कर ली है और इससे हमारे संवैधानिक मूल्यों को गहरी क्षति पहुंची है। अब समय आ गया है कि एक राष्ट्र के रूप में हम आत्मचिंतन करें और कमजोर वर्गों के प्रति पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाएं। न्याय और शांति के बगैर हमारा समाज और हमारा देश उन्नति नहीं कर सकता। अगर हमें सच्चे अर्थों में आगे बढ़ना है तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हिंसा की घटनाओं की जांच पूर्ण निष्ठा और निष्पक्षता से की जाए, सभी पीड़ितों को न्याय मिले और साम्प्रदायिक हिंसा पर कड़ाई से रोक लगाई जाए।




-राम पुनियानी

बृहस्पतिवार, 13 जून 2013

क्या प्रधानमंत्री व भाजपा अपराधी को बचा पाएंगे ?

गुजरात के इशरत जहाँ के फर्जी एनकाउंटर में आई बी के विशेष डायरेक्टर राजेंद्र कुमार को सीबीआई ने आज अभियुक्त सम्मन के द्वारा तलब किया था किन्तु उन्होंने अपने पिता की बीमारी का बहाना कर मंगलवार की तारीख उपस्थित होने के लिए ली है। वहीँ, आई बी के डायरेक्टर आसिफ इब्राहिम प्रधानमंत्री सहित देश के प्रमुख अधिकारीयों से राजेंद्र कुमार की सिफारिश की है और सीबीआई के डायरेक्टर रंजीत सिन्हा से मिलकर उनको अर्दब में लेने की भी कोशिश की है।
               सीबीआइ के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार राजेंद्र कुमार ने शुक्रवार को पूछताछ के लिए आने में असमर्थता जताई थी। इसके बाद उन्हें मंगलवार का समय दिया गया है। आशंका है कि पूछताछ के बाद राजेंद्र कुमार को गिरफ्तार भी किया जा सकता है। सीबीआइ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि फर्जी मुठभेड़ में राजेंद्र कुमार की भूमिका को लेकर उनके पास पुख्ता सुबूत हैं। मुठभेड़ के समय राजेंद्र कुमार गुजरात में आइबी के संयुक्त निदेशक के पद पर तैनात थे और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी पर लश्कर-ए-तैयबा के आत्मघाती दस्ते के हमले के बारे में उन्होंने राज्य सरकार को सचेत किया था। इसी अलर्ट को आधार बनाते हुए अहमदाबाद पुलिस की क्राइम ब्रांच ने इशरत और उसके साथियों को मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया था।  
इस अपराधी को बचाने के लिए राजनितिक दलों में मात्र भारतीय जनता पार्टी आगे आई है क्यूंकि कुर्सी पर बैठे हुए अपराधियों की पैरोकारी में इसकी भूमिका हमेशा आगे रही है। भाजपा प्रवक्ता निर्मला सीतारमण ने कहा कि इस मामले में प्रधानमंत्री को तत्काल हस्तक्षेप पर राष्ट्रहित में फैसला लेना चाहिए। उनके अनुसार देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए यह अत्यंत गंभीर मामला है। किन्तु भारतीय जनता पार्टी जब यह बयान देती है तो उसे देश के नागरिकों को इन अधिकारीयों द्वारा किये जा रहे उत्पीडन व अपराध नहीं दिखाई देते हैं। उत्तर प्रदेश में भी खालिद मुजाहिद की हत्या के बाद भारतीय जनता पार्टी ने हत्या के लिए नामजद अभियुक्तों को बचाने के लिए पैरवी की थी और पूरे प्रदेश में प्रदर्शन भी किया था। देश के नागरिकों को मार डालने वाले लोग भाजपा की नजर में असली राष्ट्रप्रेमी हैं। 
         आई बी के डायरेक्टर को भी फर्जी एनकाउंटर के मामले में हस्तक्षेप नही करना चाहिए क्यूंकि आज स्तिथि यह हो गयी है कि किसी भी व्यक्ति को पकड़ कर मार डालो और आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन व इनाम इकराम ले लो का दौर चल रहा है। इससे लोकतंत्र व न्याय समाप्त होता है। प्रधानमंत्री को भी चाहिए की अपराधी अधिकारीयों को बचाने के बजाये कठोर कार्यवाई कराएं जिससे जनता का व्यवस्था के प्रति सम्मान बढ़ सके।

सुमन 
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 12 जून 2013

खालिद मुजाहिद की हत्या के सबूतों को नष्ट करने का कार्य शुरू

आतंकवाद के नाम पर फर्जी बरामदगी के आधार पर जेल में निरुद्ध खालिद मुजाहिद की न्यायिक अभिरक्षा में हत्या हो जाने के बाद लखनऊ जेल अधीक्षक, फैजाबाद जेल के अधीक्षक व डीआईजी कारागार शरद कुलश्रेष्ठ ने मीडिया को बताया था कि खालिद मुजाहिद बीमार नही था किन्तु अब नामजद पुलिस अधिकारीयों को बचाने के लिए लखनऊ कारागार अधीक्षक दधिराम मौर्या ने सात जून को पत्र संख्या 7626 लिख कर संशय की स्तिथि पैदा करनी शुरू कर दी है। उन्होंने कारागार प्रशासन को लिखा है कि जेल के डॉ प्रदीप बिजलानी ने 18 मई 2013 को खालिद मुजाहिद को दवा दी थी और डाक्टरी रिपोर्ट के अनुसार खालिद मुजाहिद को लेफ्ट साइड चेस्ट पेन था। इस पत्र को जनता में संशय फैलाने के लिए राजधानी लखनऊ के एक समाचार पत्र में प्रमुखता के साथ प्रकाशित भी कराया गया है। यह अखबार पुलिस अधिकारीयों को बचाने के लिए काफी समय
से तथ्यों में तोड़-मरोड़ कर समाचार प्रकाशित कर रहा है यदि खालिद मुजाहिद की तबीयत ख़राब थी तो 300 किलोमीटर की यात्रा करने की अनुमति जेल प्रशासन ने कैसे दी। वहीँ बाराबंकी पुलिस साक्ष्यों को नष्ट करने के लिए न्यायलय की अनुमति लेकर विसरा को जांच करने के लिए भेज दिया जबकि उत्तर प्रदेश सरकार ने उक्त वाद की विवेचना सीबीआई द्वारा करने की घोषणा कर चुकी है। इस तरह यह साबित होता है कि पुलिस अधिकारीयों को गिरफ्तारी से बचाने के लिए तथ्यों से छेड़छाड़ की जा रही है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 11 जून 2013

इंटेलिजेंस ब्यूरो के विशेष निदेशक को सीबीआई ने अभियुक्त बनाया

सीएनएन आईबीएन न्यूज़ चैनल द्वारा प्रसारित समाचार के अनुसार सीबीआई ने मंगलवार के दिन इंटेलिजेंस ब्यूरो के विशेष डायरेक्टर राजेंद्र कुमार को जो की इशरत जहाँ फर्जी एनकाउंटर केस में सीबीआई तफ्तीश में शामिल थे, को सम्मन बहैसियत अभियुक्त जारी कर दिया है। न्यूज़ चैनल के अनुसार सीबीआई ने अभियुक्त राजेंद्र कुमार को वर्ष 2001 से वर्ष 2005 तक गुजरात प्रान्त में हुए तमाम पुलिस एनकाउंटर्स में गलत सूचना प्रेषित करने का जिम्मेदार ठहराया है।
             सीबीआई द्वारा यह सम्मन उच्चतम न्यायलय द्वारा इशरत जहाँ फर्जी एनकाउंटर केस के अभियुक्त व गुजरात पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक पी पी पाण्डेय के अरेस्ट याचिका निरस्त होने के बाद सीबीआई ने राजेंद्र कुमार को अभियुक्त सम्मन जारी कर दिया। पी पी पाण्डेय का अजमानतीय वारंट पहले से ही मजिस्ट्रेट द्वारा जारी है।
 ज्ञातव्य है कि बाराबंकी कोतवाली के अपराध संख्या 295/2013 में अंतर्गत धारा 120B व 302 आईपीसी के केस में इंटेलिजेंस ब्यूरो भी अभियुक्त है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 10 जून 2013

मौलाना आजाद और शिक्षा

सच्चर समिति ने मुसलमानों के  शैक्षणिक पिछड़ेपन का अत्यंत गहन  अध्ययन किया है। समिति ने यह पाया है कि मुसलमान, शिक्षा के मामले में लगभग हर स्तर पर पिछड़े हैं। उनकी साक्षरता दर, राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के पहले स्कूल छोड़ने वाले मुसलमान बच्चों का प्रतिशत काफी अधिक है और इसलिए, स्नातक व स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में भर्ती होने वाले मुसलमान विद्यार्थियों की संख्या, उनकी आबादी के अनुपात में बहुत कम है। मुसलमानों के इस शैक्षणिक पिछड़ेपन के लिए कई अलग.अलग कारणों को जिम्मेदार बताया जा जाता है। मूलतः, दो प्रकार की बातें कही जाती हैं। पहली यह कि इस स्थिति के लिए इस्लाम जिम्मेदार है क्योंकि वह धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के खिलाफ है। कुछ अन्य लोग, इस्लाम को दोषी ठहराने की बजाय, मुसलमानों को कटघरे में खड़ा करते हैं। उनका कहना है कि मुसलमानों की अपने बच्चों को स्कूल भेजने में रूचि ही नहीं है। दूसरे कारण को सही मानने वाले लोग हमारी शिक्षा व्यवस्था का अध्ययन और विवेचन कर यह पता लगाना चाहते हैं कि अल्पसंख्यकों, दलितों व आदिवासियों को इस व्यवस्था में पर्याप्त तवज्जो क्यों नहीं मिल रही है। इसके विपरीत, पहले कारण को सही मानने वालों में से बहुसंख्यक या तो साम्प्रदायिक सोच रखते हैं या फिर बिना सोच.समझे, जल्दबाजी में अपनी राय बनाने के आदि हैं। दूसरे कारण में विश्वास रखने वालों में शिक्षाविदों की खासी संख्या है और विशेषकर ऐसे शिक्षाविदों की, जो शैक्षणिक पिछड़ेपन की समस्या से जूझ रहे हैं।
मुसलमानों में शैक्षणिक पिछड़ेपन के कारण
मुसलमानों में शैक्षणिक पिछड़ेपन के पीछे सबसे बड़ा कारण है गरीबी। मुसलमानों में भाषाई और क्षेत्रीय आधारों पर व जाति.बिरादरियों के कारण बहुत विविधता है। वे मुस्लिम बिरादरियां, जिनकी अपेक्षाकृत बेहतर आमदनी है, शैक्षणिक रूप से भी आगे हैं। उदाहरणार्थ बोहरा, खोजा और मेमनय मेहतरों, बागवानों और तेलियों से शिक्षा के मामले में कहीं आगे हैं। अंसारी और कुरैशी जैसी बिरादरियां भी अपने बच्चों को शिक्षा दिलवाने में रूचि ले रही हैं और उनके कई सदस्य, व्यावासायिक पाठ्यक्रमों में भी दाखिला ले रहे हैं। मुसलमानों में शिक्षा की प्यास और उसके महत्व का अहसास, बाबरी ध्वंस और उसके बाद हुए दंगों के समय से तेजी से बढ़ा है। शिक्षा को एक ऐसी कुंजी के रूप में देखा जा रहा है जो आपको इस तरह की सुरक्षित नौकरियां और रोजगार दिलवा सकती है, जो दंगों के दौरान नष्ट नहीं होती। दसवीं और बारहवीं कक्षाओं की परीक्षाओं में मुस्लिम लड़कियां मेरिट लिस्ट में स्थान पा रही हैं। हाल में एक तथ्यान्वेषण मिशन के दौरान जब हम एक कॉन्वेंट स्कूल में पहुंचे तो हमने देखा कि घरेलू कामकाज कर अपनी जीविका चलाने वाली एक मुस्लिम महिला, स्कूल के प्राचार्य से बहस में जुटी है। प्रिंसिपल का कहना था कि स्कूल की फीस इतनी अधिक है कि वह उसे चुका न सकेगी परन्तु महिला का तर्क था कि उसे चाहे एक वक्त भूखा ही क्यों न रहना पड़े या और घरों में काम क्यों ना करना पड़े, परन्तु वह अपने बच्चे को उसी स्कूल में पढ़ायेगी।
गरीब मुस्लिम परिवारों को, आमदनी की खातिर, अपने छोटे बच्चों को काम.धंधों में लगा देना पड़ता है। ज़रदोसी, कालीन, चूड़ियां और कई अन्य उद्योगों में काम करने वाले बाल श्रमिकों में मुसलमान बच्चों की संख्या खासी है। कई मुस्लिम बच्चों का कौशल का स्तर काफी ऊँचा होता है परन्तु किसी औपचारिक प्रशिक्षण व प्रमाणपत्र के अभाव मेंए उन्हें अच्छी आमदनी वाले काम नहीं मिल पाते। कम आय का असर अगली पीढ़ी पर भी पड़ता है। एक पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी के लिए आय के कोई स्थायी स्त्रोत नहीं छोड़ जाती और नतीजे में गरीबी का दुष्चक्र चलता रहता है। साम्प्रदायिक दंगों के दौरान अपनी कड़ी मेहनत से जुटाई गई थोड़ी.बहुत संपत्ति भी मुस्लिम परिवार खो बैठते हैं। उन्हें न पर्याप्त मुआवजा मिलता है और ना ही उनका पुनर्वास होता है। मुसलमानों के छोटे से मध्यम वर्ग में से भी कई परिवार निम्न वर्ग में खिसक गये हैं क्योंकि दंगों में उनके छोटे.मोटे व्यवसाय नष्ट हो गए। लगभग 75 से 80 प्रतिशत मुसलमान, शारीरिक श्रम या हस्तकौशल से अपनी आजीविका कमा रहे हैं।
अक्सर मुसलमान अपने ही मोहल्लों में रहते हैं, जो शहरों या गांव के बाहरी इलाकों में बसाये जाते हैं। इन मोहल्लों में सड़क, पानी व बिजली की सुविधाओं और बैंकिंग व शैक्षणिक संस्थाओं का अभाव रहता है। चूँकि ऐसे मोहल्लों में अक्सर स्कूल नहीं होते इसलिए बच्चों को दूर के स्कूलों में पढ़ने जाना पड़ता है। इससे शिक्षा का खर्च बढ़ जाता है। दूर के स्कूलों में बच्चों, विशेषकर लड़कियों, को भेजने से मां.बाप डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि साम्प्रदायिक हिंसा भड़कने की स्थिति में उनके बच्चों को नुकसान पहंुचाया जा सकता है। यही कारण है कि मुस्लिम अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ाई पूरी होने से पहले ही स्कूल से निकाल लेते हैं। सच्चर समिति की रपट के अनुसार, किसी इलाके की आबादी में मुसलमानों का अनुपात जितना ज्यादा होता है, उस इलाके में मूलभूत सुविधाओं की उतनी ही कमी होती है।
एक अन्य कारण है मुस्लिम बच्चों के प्रति स्कूल प्रबंधनों का भेदभावपूर्ण रवैया। हमारे दिमाग में भी पूर्वाग्रह होते हैं। हम में से कई को लगता है कि मुस्लिम बच्चों को उर्दू माध्यम से पढ़ना चाहिए भले ही उर्दू उनकी मातृभाषा न हो। यह मानकर चला जाता है कि वे पढ़ाई.लिखाई में फिसड्डी होंगे। इसके अलावा, स्कूलों का अजनबी वातावरण, वहां सरस्वती वंदनाए गीता की पढ़ाई, सूर्य नमस्कार और इसी तरह की अन्य गतिविधियों के कारण भी मुस्लिम बच्चे अपनी शिक्षा जारी नहीं रखते।
मुसलमानों के शैक्षणिक पिछड़ेपन का एक अन्य कारण है राजनैतिक ढांचे में उनका कम प्रतिनिधित्व। अधिकांश प्रजातांत्रिक, राजनैतिक संस्थाओं में उनकी उपस्थिति, उनकी आबादी के अनुपात के एक.तिहाई से भी कम है। जरूरत पड़ने पर अभिभावकों को कोई ऐसा व्यक्ति नजर नहीं आता जिससे वे कोई जानकारी हासिल कर सकें या प्रमाणपत्र आदि प्राप्त कर सकें। मुस्लिम प्रबंधन वाले अच्छे स्कूल बहुत कम हैं। कई ऐसे मुस्लिम ट्रस्ट हैं जो शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना करना चाहते हैं परन्तु सरकारें अक्सर उनकी मदद नहीं करतीं। उन्हें जमीन नही दी जाती, उन्हें अनुदान नहीं मिलता और यहां तक कि उन्हें मान्यता देने में भी आनाकानी की जाती है।
राजनैतिक नेतृत्व में मुसलमानों की संख्या कम तो है हीए उनके नेताओं की सोच के कारण भी कई समस्याएं उभर रही हैं। समुदाय का राजनैतिक नेतृत्व अक्सर उच्च जाति के धर्मपरिवर्तित मुसलमानों, जिन्हें अशरफ कहा जाता है, के हितों की रक्षा करता है। यह नेतृत्व केवल पहचान से जुड़े मुद्दे उछालता रहता है और कुरान की चहारदीवारी में रहते हुए भीए शरीयत कानूनों में किसी प्रकार के बदलाव की  मुखालिफत करता है। सत्ताधारी वर्ग भी यह चाहता है कि शरीयत कानूनों और इस्लामिक विधिशास्त्र की मध्यकालीन विवेचना को ही स्वीकृति मिली रहे। यह विवेचना न केवल महिलाओं के साथ भेदभाव करती है वरन् कुरान की मूल आत्मा की खिलाफ भी है। मुस्लिम पर्सनल ला के मुद्दे पर शोर मचाकर राजनैतिक नेतृत्व यह सोचता है कि उसने अपने कर्तव्य का पालन कर दिया। चंद अपवादों को छोड़कर, ऐसे मुसलमान नेताओं की संख्या गिनीचुनी है, जो मुसलमानों की शिक्षा और उनकी रोजी.रोटी से जुड़े मुद्दे उठाते हों।
भारत में अच्छे प्राथमिक और उच्चतर माध्यमिक स्कूलों की भारी कमी है। ये स्कूल मुख्यतः शहरी इलाकों में हैं और इनमें मुसलमानो को आसानी से प्रवेश नहीं मिलता। भारतीय राज्य को यह अहसास हो गया है कि अगर देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, पिछड़ा और अशिक्षित बना रहेगा तो देश प्रगति नहीं कर सकेगा। इसलिए सच्चर समिति की नियुक्ति की गई और प्रधानमंत्री के नये पंद्रह सूत्रीय कार्यक्रम जैसे कुछ कदम उठाये गए। ये कार्यक्रम मुसलमानों की समस्याओं में से सिर्फ एक.गरीबी.पर केन्द्रित हैं। इन कार्यक्रमों में शामिल हैं मुस्लिम बच्चों के लिए वजीफे, होस्टल की सुविधाएं, शैक्षणिक ऋण और कई अन्य चीजें। परन्तु इस कार्यक्रम के साथ कई समस्याएं हैं.पर्याप्त धनराशि का अभाव, नौकरशाही में इच्छाशक्ति की कमी और समुदाय की असली समस्याओं से निपटने के लिए उचित नीतियों का अभाव। स्थान की कमी के कारण हम यहां मुसलमानों में शिक्षा को प्रोत्साहन देने वाले कार्यक्रमों की विफलता के कारणों पर चर्चा नहीं करेंगे। गरीबी इसके कई कारणों में से सिर्फ एक है और इससे मुकाबला करने की सरकार द्वारा, आधे.अधूरे मन से ही सही, कुछ कोशिश की जा रही है परन्तु विभिन्न कारणों से सफलता का प्रतिशत काफी कम है।
मौलाना आजाद की शिक्षा के संबंध में सोच
अगर मौलाना आजाद भारत सरकार को शिक्षा संबंधी अपनी नीतियों को लागू करने के लिए राजी करने में सफल हो जाते तो आज का परिदृश्य कुछ अलग ही होता। उनके लिए भारत सरकार की शिक्षा नीति, उसकी उद्योग नीति से भी अधिक महत्वपूर्ण थी। स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री की हैसियत से मौलाना आजाद हमारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूती देना और उसका प्रजातांत्रिकरण करना चाहते थे। वे चाहते थे कि शिक्षा का इस तरह से प्रजातांत्रिकरण किया जाए कि उच्च जातियों और वर्गों का उस पर कसा शिकंजा ढीला पड़ सके।
उनके चार लक्ष्य थे:- 
प्राथमिक से माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा के लोकव्यापीकरण के जरिए निरक्षरता पर प्रहार। प्रौढ शिक्षा व महिलाओं की शिक्षा पर जोर।    
2. बिना जाति, समुदाय या वर्ग के भेदभाव केए पूरे भारतीय समाज में शिक्षा के अवसरों की समानता सुनिश्चित करना।
3. त्रिभाषा फार्मूला एवं
4. पूरे राष्ट्र में मजबूत प्राथमिक शिक्षा तंत्र की स्थापना।
मौलाना आजाद का यह मत था कि हर व्यक्ति को ऐसी शिक्षा पाने का हक है जो उसे उसकी क्षमताओं का पूरा विकास करने और मानव जीवन को उसकी संपूर्णता में जीने का अवसर प्रदान करे। ऐसी शिक्षा पाना हर व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। राज्य तब तक यह दावा नहीं कर सकता कि उसने अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर दिया है जब तक कि वह प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त करने और स्वयं का विकास करने के आवश्यक साधन उपलब्ध नहीं करवा देता  .रोजगार का मुद्दा अलग है। राज्य को अपने सभी नागरिकों को माध्यमिक स्तर तक शिक्षा की सुविधा उपलब्ध करवानी चाहिए।
मौलाना आजाद का यह मानना था कि कुछ ही समय पहले विदेशी शासन से मुक्त हुए भारतीयों में एक अच्छे नागरिक के गुण विकसित करने और उन्हें जाति और लैंगिक भेदभाव की प्रवृति से मुक्ति दिलाने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। उनकी मान्यता थी कि नागरिकों को समानता का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए और उन्हें भारत की धार्मिक, नस्लीय और भाषायी विविधता के संबंध में संवेदनशील बनाया जाना चाहिए। मौलाना आजाद का मानना था कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण के लिए भारत को अपने कुल बजट का कम से कम दस फीसदी हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना होगा। हमारे देश में अब तक शिक्षा के लिए कभी भी छः प्रतिशत से अधिक बजट का आवंटन नहीं किया गया और सामान्यताः तो दो से तीन प्रतिशत बजट ही शिक्षा पर खर्च किया जाता है। मौलाना चाहते थे कि शिक्षा के बजट को मुख्यतः प्राथमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा और महिला व प्रौढ़ शिक्षा पर खर्च किया जाए। इसके लिए गांव और कस्बों में स्कूलों के ढांचे को मजबूती देना आवश्यक होगा और हिंदुओं, ईसाइयों और मुसलमानों की इन स्कूलों तक बराबर पहुंच को सुनिश्चित करना होगा। भारत के स्कूल, बच्चों को समानता और न्याय के मूल्यों से परिचित करवायेंगे और उन्हें भारत की विविधता का सम्मान करना सिखायेंगे। मौलाना आजाद का जोर सभी धर्मों के मूल्यों को स्कूलों के पाठ्यक्रमों में शामिल करने पर था।
असल में हुआ यह कि भारतीय राज्य ने न केवल शिक्षा पर काफी कम खर्च किया अपितु बजट का बहुत बड़ा हिस्सा आई।आई.टी., आई.आई.एम., एम्स व जे.एन.यू. जैसे उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना पर खर्च कर दिया गया। इनमें से अधिकांश संस्थान महानगरों में हैं और इनमें वे ही विद्यार्थी प्रवेश पा सकते हैं जो कि महंगे निजी स्कूलों में पढ़ने के बाद अंग्रेजी में होने वाली इन संस्थानों की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए महंगी कोचिंग ले सकते हैं। इन प्रतिष्ठित संस्थानों के दरवाजे गरीबों और कमजोरों के लिए बंद हैं। अनुसूचित जातियों, जनजातियों, पिछड़ों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को इन संस्थानों में प्रवेश पाने में खासी दिक्कत पेश आती हैं। उच्च शिक्षा के इन चंद उच्च.स्तरीय द्वीपों की स्थापनाए प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों की कीमत पर की गई है। एक आईआईटी या आईआईएम की स्थापना पर जितना खर्च होता है, उससे हजारों नहीं तो सैंकड़ों प्राथमिक शालाएं खोली जा सकती हैं।
निष्कर्ष
इस्लाम शिक्षा पर बहुत जोर देता है। तीय निधि व इब्नमज़ा के अनुसार इब्ने अब्बास ने बताया कि अल्लाह के पैगम्बर ने कहा धर्मशास्त्र का एक विद्वान, शैतान पर एक हजार श्रृद्धालुओं से ज्यादा भारी पड़ता है। मुसलमानों का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य यह है कि वे ज्ञान हासिल करें, इस ज्ञान का उपयोग अपने जीवन में करें और इस ज्ञान का प्रकाश पूरे समाज में फैलाएं। कोई व्यक्ति तब तक सच्चा मुसलमान कहलाने के काबिल नहीं है तब तक कि वह इस्लाम का असली अर्थ न समझ ले। कोई व्यक्ति केवल  मुस्लिम परिवार में जन्म लेने से मुसलमान नहीं बनता बल्कि वह अपने ज्ञान और कर्मों से मुसलमान बनता है। इस्लाम का तार्किकता पर बहुत जोर है। परन्तु मुस्लिम धार्मिक और राजनैतिक नेताओं ने इस्लाम के इस पक्ष पर कभी जोर नहीं दिया। शायद मौलाना आजाद इस्लाम की अपनी समझ से प्रेरित होकर ही ज्ञान और शिक्षा फैलाने की बात कर रहे थे।
शिक्षा वह अस्त्र है जो किसी भी समुदाय के सदस्यों को सामूहिक सामाजिक जीवन में हिस्सा लेने और उसमें अर्थपूर्ण योगदान देने की क्षमता प्रदान करता है। शिक्षा हमें वह मूल्य देती है जो शान्तिपूर्ण सामूहिक जीवन, पर्यावरण व प्रकृति की रक्षा, ज्ञान का विकास और बेहतर समझ पैदा करने में हमारी मदद करते हैं। शिक्षा हमें वह कौशल या ज्ञान भी देती है जिसके जरिए हम अपनी रोजी.रोटी कमा सकते हैं।
शिक्षा एक अनवरत प्रक्रिया है। हम जीवन के अपने संघर्ष सेए अन्य व्यक्तियों के संपर्क में आने से और अपने विभिन्न अनुभवों से कुछ न कुछ सीखते रहते हैं। हम अपने परिवार और समुदाय से भी ज्ञान प्राप्त करते हैं। परन्तु अर्थपूर्ण शिक्षा केवल ज्ञान के केन्द्रों अर्थात् स्कूल, कालेज, अनुसंधान संस्थान, विश्वविद्यालय व अन्य शिक्षा संस्थान हैं। उच्च स्तर की व्यावसायिक शिक्षा तक पहुंच,
उच्च वर्ग तक सीमित  है। भारत में मुसलमानों को इन संस्थाओं में बहुत कम संख्या में प्रवेश मिला पाता है। मजे की बात यह है कि मुसलमानों के शैक्षणिक पिछड़ेपन के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया जाता है। अगर हम मौलाना आजाद के बताए रास्ते पर चले होते तो सारे राष्ट्र को इससे लाभ होता। अभी भी बहुत देर नहीं हुई है। हम अब भी मौलाना आजाद के सपनों को साकार करने के काम में जुट सकते हैं।

-इरफान इंजीनियर